औरतें पैदा नही होती बनाई जाती है – प्रोफ़ेसर समीना ख़ान

Mar 09, 2017
औरतें पैदा नही होती बनाई जाती है – प्रोफ़ेसर समीना ख़ान

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी विभाग के साहित्य समिति की ओर से आयोजित व्याख्यान और कविता पाठ का आयोजन किया गया जिसमें प्रोफ़ेसर समीना ख़ान ने अपने विचार रखे और कई ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयो पर प्रकाश डाला जो बेहद विचारणीय और सत्य घटना पर आधारित है जिसको हम रोजमर्रा की ज़िंदगी में देखते भी है। उन्होंने कहा जब कोई बच्चा गर्भ में होता है तो ना ही माँ को मालूम होता है और ना ही उसके पिता को मालूम होता है कि आखिर उसका लिंग क्या है ? जब वो इस दुनियाँ में आ जाता है तो संसार के लोगो को मालूम होता है कि यह लड़का है या लड़की ।

लड़का लड़की बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले माँ और पिता ही उसको बताते है कि आखिर उसको कैसे और किस तरह से रहना है। उसके बाद जब उसके बालों की चोटी बनाकर, उसके साथ भेदभाव करके समाज में वो जाती है तो उसको पहले ही डरा दिया जाता है कि वो एक लड़की है और उसको यह करना है और यह नही करना है। प्रोफ़ेसर खान कहती है -“भले ही उसकी शारीरिक बनाबट कुछ भी हो लेकिन वो भी एक इंसान है जो समाज में पुरुषों के बराबर महत्त्व रखती है जिसको झुठलाया भी नही जा सकता है क्योंकि लगभग हर देश का कानून इसकी आज़ादी भी देता है”।

कानूनी तौर पर समानता तो मिली, फैसले भी आये लेकिन अब तक महिलाओं को इन्साफ नही मिला यदि देखा जाये पश्चिमी दुनियाँ ने नारी मुक्तिकरण की शुरुआत तो की और नारी सशक्तिकरण की आवाज़ को बुलन्द करने का श्रेय पूर्वी दुनियाँ को जाता है दोनों दुनियां के बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे को उठाया लेकिन अफ़सोस आज भी इन्साफ नही मिला है देश और दुनियाँ में औरतों के साथ हो रहे अभद्र व्यवहार बलात्कार, दहेज़ के खातिर उनका शोषण आज भी रुका नही है जो एक विचारणीय पक्ष है जिस पर मानवता के खातिर सोचने समझने का हमे प्रयत्न करना चाहिए वर्तमान मुद्दों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से राजनीति मुद्दों से की जा रही है वो बहुत ही दयनीय और अशोभनीय है यदि आपको महिलाओं को अधिकार देना है तो सबसे पहले अपने घर से शुरुआत करना होगी फिर किसी धर्म के बारे में टिप्पणी करने का अधिकार है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि धर्मो में औरतों को बराबर अधिकार दिए गए है लेकिन कुछ ऐसी कुंठित मान्यताओं के खातिर आज देश के राजनेता उन मुद्दों पर राजनीति करके अपना वोट बैंक का हित देख रहे है जो सभ्य समाज और बुद्धिजीवियों के लिए विचार करने का विषय है उन्होंने कहा इस्लाम का जन्म ही फेमिनिज्म से हुआ है ना जाने क्यों आजकल लोग उस पर उलटे सीधे आरोप लगाते है जिसमे कहीं ना कहीं मुझे उसमे राजनीति की बू आती है।

यदि सामाजिक न्याय की बात की जाए तो पीड़ित का कोई धर्म जाति नही होती है बल्कि वो तो इन्साफ चाहती है महिलाओं पर बड़ते अत्याचार, दहेज़ के मामले , बलात्कार, उनको बेचने का व्यापार पर चिंता ज़ाहिर करते हुए बहुत ही भावुक अंदाज़ में उन्होंने कहा कि यदि इन सब मुद्दों से औरतों को लड़ना है तो शिक्षित होना पड़ेगा जिससे उनको समानता, इन्साफ और अपने विचारों की आज़ादी मिल पाएगी । इस सभा में अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफ़ेसर अब्दुल अलीम सर ने कुछ अनछुए बिन्दुओ पर बोलते हुए पूरे माहौल को बदलने की कोशिश की और कहा यदि हम सच में बदलाओ चाहते है तो हमे औरत को औरत ना समझकर बराबरी का हक़ देना चाहिए और घर परिवार के सभी फैसलों में बराबर का हक़ देना चाहिए जिससे देश जल्दी ही तरक़्क़ी करेगा और हम फिर से पूरी दुनियाँ के बराबर खड़े होंगे। साहित्य समिति के प्रभारी प्रोफ़ेसर शंभूनाथ तिवारी ने महिलाओं की स्वंतंत्रता और मूल्य दोनों को ज़रूरी बताते हुए उनपर विस्तार से चर्चा की। सभागर में शोध समिति के प्रभारी प्रोफ़ेसर मेराज अहमद, प्रोफ़ेसर कमलानन्द झा, डॉ राहिला रईस, सना फातिमा, डॉ शाहवाज़ अली खान, डॉ जावेद आलम, डॉ दीपशिखा सिंह अनेक शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद थे ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, 24HindiNews की सहमति आवश्यक नहीं )
 –अकरम हुसैन कादरी
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