बने रहेंगे, बढ़ते रहेंगे, सहारा इंडिया

Aug 16, 2016

सहारा इंडिया परिवार के मुख्य अभिभावक परम आदरणीय सहाराश्री जी ने अपने अनुभव और अद्भुत सोच के आधार पर 15 अगस्त 1991 को एक रचनात्मक आंदोलन की अभिव्यक्ति राष्ट्रीय सहारा के प्रकाशन से की थी.

तमाम उतार-चढ़ाव के बीच संघषर्रत रहते हुए आज हम राष्ट्रीय सहारा का रजत जयंती वर्ष मनाते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहे हैं. प्रतिबद्ध पत्रकारिता को समर्पित हमारा समाचार पत्र अपने शुरुआती समय से ही हमारे मुख्य अभिभावक सहाराश्री के दिशा-निर्देशों के साथ नयी इबारतें लिखने का साहसिक काम करता आ रहा है, और यह जारी रहेगा. बहुआयामी और निरंतर मिलने वाले प्रोत्साहन के चलते पत्रकारिता की स्थापित मान्यताओं को हमने जिस ऊर्जा और विास के साथ नया स्वरूप दिया था, आज भी उसकी अहमियत बरकरार है. हमारे द्वारा स्थापित प्रतिमान सम्पूर्ण व्यवस्था व समाज के पथ-प्रदर्शक साबित होते रहे हैं.

आज मीडिया की सक्रियता से समाज और व्यवस्था को जरूर फायदा हो रहा है पर यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि मीडिया की अति सक्रियता का खमियाजा भी हम ही भोग रहे हैं. जाहिर है, मीडिया में जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा हावी है. समय का दबाव है, खबरों की प्रस्तुति में उनके महत्व और सच्चाई से ज्यादा सनसनीखेज बनाने का चलन हो गया है. पत्रकारिता का मूल मकसद इस सबमें कहीं गुम होता नजर आ रहा है. मीडिया की इस अंधी-दौड़ का हिस्सा हम कभी इसीलिए नहीं रहे. वजह यह कि हमने अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से कभी समझौता नहीं किया.

परमआदरणीय सहाराश्री की सोच की विशालता और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदार विचारधारा ने प्रतिस्पर्धा में पड़े बगैर निरंतर उन्नति का मार्ग दिखाया. परिस्थितियां कुछ भी रही हों, उन्होंने राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखा. हमने अपने कर्तव्यों का पूर्ण समर्पण के साथ निरंतर निर्वहन किया. उनका यह दृढ़ विश्वास रहा है कि किसी के बारे में यदि कोई खबर लिखी जा रही हो या दिखाने की तैयारी करने से पहले सम्बन्धित व्यक्ति का पक्ष अवश्य शामिल किया जाए यानी पूर्ण सत्य सामने आये. सदैव ही हमने समाचारों की निष्पक्षता बनाए रखी, खबरें कभी अतिरंजित, सनसनीखेज या ‘बिकाऊ’ नहीं होने दी. अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का साक्षी/साझीदार बनते हुए समाचार और विचार के स्तर पर सदैव ही अपनी जनपक्षीय और समाजपक्षीय भूमिकाओं को पूरी जिम्मेदारी से निभाने का ईमानदार प्रयास किया है. सूचनाओं की पड़ताल किये बिना या संबंधित पक्ष की टिप्पणी के अभाव में खबर को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के बजाए उनकी विश्वसनीयता को भरसक बचाते रहने के प्रयास किये जाते रहे हैं. किसी भी खबर की प्रस्तुति से पहले उसकी सच्चाई को परखना सिर्फ व्यावसायिक दायित्व भर नहीं होता, यह सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी होती है. इस बात की संतुष्टि है कि हम अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभा रहे हैं.

अपने फीचर परिशिष्ट ‘उमंग’ के माध्यम से हमने पाठकों को वह सब उपलब्ध कराया, जो मनोरंजक भी था और रोचक तथा पठनीय भी. गरिमामय सम्पादकीय पृष्ठ में प्रकाशित लेख सामयिक मुद्दों की विवेचना पर केंद्रित रहे तो सम्पादकीय टिप्पणियां निर्भीकता से अखबार का पक्ष प्रस्तुत करती रहीं. जहां प्रहार आवश्यक था, प्रहार किया और जहां प्रशंसा उचित थी, प्रशंसा की. जो देश-समाज के हित में घटित हुआ, उसकी सराहना की और जब इसके उलट हुआ तो बिना डर-झिझक के सटीक आलोचना भी खूब की.

राष्ट्रीय सहारा काविशिष्ट योगदान इसके वैचारिक परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’ के रूप में रहा. यह हिन्दी का पहला और अकेला अखबार है, जिसमें इस तरह का गम्भीर वैचारिक आयोजन किया गया. चार पृष्ठों वाला संवाद का यह वैचारिक मंच किसी भी क्षेत्र में उठे सवालों को बहस के रूप में विभिन्न आयामों के साथ रखता रहा है. जिम्मेदारी के तहत देश की गलत आर्थिक नीतियों के विरुद्ध, जनसंख्या वृद्धि जैसी आत्मघाती सामाजिक समस्याओं और चुनाव पद्धति की खामियों जैसी व्यवस्थागत समस्याओं पर निरंतर प्रामाणिक और तथ्यसंगत आलेख प्रकाशित करने के लम्बे अभियान चलाकर सही नीतियों के पक्ष में हमने जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई. राष्ट्रीय सहारा ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की; इसका श्रेय सबको सामूहिक रूप से जाता है, जो 25 साल के सफर में किसी ने किसी मोड़ पर, किसी न किसी रूप में इससे जुड़े और सक्रिय भूमिका निभाते रहे.

रजत जयंती के सुअवसर पर राष्ट्रीय सहारा की पूरी टीम और इससे जुड़े प्रत्येक को बहुत सारी शुभकामनाएं. साथ ही जिन विशिष्ट लोगों ने हमें सफलता और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं हैं, हम हृदय से उनके आभारी हैं. भविष्य में भी उनके सुझाव व मार्गदर्शन का हम सम्मान करेंगे.

भारत पर्व एवं रजत जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

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