महबूबा ने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए अपने हाथ में ली जम्मू-कश्मीर की कमान

Apr 04, 2016

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में तब्दील करने वालीं जमीनी स्तर की लोकप्रिय नेता महबूबा मुफ्ती अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए जम्मू-कश्मीर की कमान अपने हाथ में ले चुकी हैं.

वह इस राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गई हैं. विधि स्नातक महबूबा (56) ने अपने पिता के साथ वर्ष 1996 में कांग्रेस से जुड़कर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रख दिया था. उस समय आतंकवाद अपने चरम पर था.

पीडीपी के प्रसार का श्रेय महबूबा को दिया जाता है. कुछ पर्यवेक्षकों का तो यह तक मानना है कि आम जनता और विशेषकर युवाओं को अपने साथ जोड़ने के मामले में वह अपने पिता से भी आगे निकल गईं.

उन पर नरम-अलगाववादी कार्ड खेलने का भी आरोप लगता रहा है. पीडीपी ने अपनी पार्टी के झंडे के लिए हरे रंग का चयन किया और अपने चुनाव चिन्ह के रूप में उसने वर्ष 1987 के मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के कलम-दवात को ही चुना.

एक-दूसरे से पूरी तरह विपरीत विचारधारा रखने वाले दो दलों पीडीपी और भाजपा के गठबंधन से गठित सरकार का नेतृत्व महबूबा के लिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वह अपने पिता की ‘मरहम लगाने की’ विरासत को आगे ले जाने की पूरी कोशिश करेंगी.

दो बेटियों की मां महबूबा की छवि एक दबंग नेता की है और उन्होंने अपना पहला विधानसभा चुनाव कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपने गृहक्षेत्र बिजबेहड़ा से जीता था.

महबूबा ने वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार बने अपने पिता की जीत में एक अहम भूमिका निभाई थी. तब उनके पिता ने दक्षिण कश्मीर से नेशनल कांफ्रेंस के उम्मीदवार मोहम्मद यूसुफ ताइंग को हराया था.

सईद के अंदर कश्मीर में शांति वापस लाने के लिए कुछ करने की एक चाह थी और महबूबा उनके साथ ही थीं. दोनों पिता-पुत्री ने मिलकर वर्ष 1999 में अपनी क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी की शुरूआत कर दी.

उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस से नाराज कई नेताओं को अपने साथ लिया. कुछ नेता उस कांग्रेस से भी थे, जिसके साथ सईद ने अपने छह दशक के राजनीतिक करियर का अधिकांश समय बिताया था.

नई पार्टी के गठन की जिम्मेदरी महबूबा ने ले ली थी.

महबूबा आतंकवाद से जुड़ी हिंसा में मारे गए लोगों के घर जाती थीं. महिलाओं को रोने के लिए अपना कंधा देकर उन्होंने लोगों की और खासतौर पर महिलाओं की नब्ज को छू लिया था.

वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी के खाते में 16 सीटें आई थीं और इनमें से अधिकतर सीटें दक्षिण कश्मीर से थीं. इस क्षेत्र में महबूबा ने व्यापक प्रचार किया था और अपनी पार्टी के लिए भारी समर्थन जुटाया था. उनके पिता ने अपनी पूर्व पार्टी कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

दो साल बाद, महबूबा ने दक्षिण कश्मीर से संसदीय चुनाव लड़ा और वह अपना पहला लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहीं.

उन्होंने वर्ष 1999 में भी श्रीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी उमर अब्दुल्ला ने उन्हें हरा दिया था.

अमरनाथ की जमीन से जुड़ा विवाद उठने पर महबूबा ने अपने पिता को कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बनाई गई सरकार से बाहर आने के लिए मनाने में एक अहम भूमिका निभाई. उस समय सरकार की कमान गुलाम नबी आजाद के हाथ थी.

वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में महबूबा ने दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के वाची से चुनाव लड़ा और जीता. उनकी पार्टी की सीट संख्या बढ़कर 21 हो गई थी लेकिन उन्होंने विपक्ष में रहना ही पसंद किया.

नेशनल कांफ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली थी. कांग्रेस अब भी अमरनाथ जमीनी विवाद के बाद पीडीपी से मिले ‘विश्वासघात’ की टीस पाले हुए थी.

विपक्ष में रहकर बिताए वर्षों में महबूबा ने पार्टी के समर्थन की जमीन मजबूत की और नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की कथित विफलताएं रेखांकित कीं.

उन्हें एक बेहद सक्रिय विपक्षी नेता के रूप में देखा जाता था, जिसका नतीजा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में साफ तौर पर देखने को मिला. उनकी पार्टी घाटी की तीनों सीटें जीत गई थी.

कुछ माह बाद, पीडीपी विधानसभा की 28 सीटें जीतकर राज्य की इकलौती सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई. इसके साथ ही महबूबा के पिता के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रास्ता खुल गया था.

कई माह तक भारी चर्चाओं के बाद मार्च 2015 में पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में भाजपा के साथ गठबंधन करते हुए सरकार बनाई.

हालांकि सरकार के गठन के बाद महबूबा ने खुद को थोड़ा पीछे ही रखा लेकिन सईद के खराब स्वास्थ्य की खबरें आने के बाद वह कहीं ज्यादा केंद्रीय भूमिका में आ गई थीं. अधिकतर सार्वजनिक समारोहों में उन्हें उनके पिता के साथ देखा गया.

सईद की सेहत में गिरावट आने के साथ पार्टी आलाकमान बदलने के बारे में कयास लगने लगे थे. सईद ने खुद इन कयासों को उस समय बल दे दिया था, जब उन्होंने यह संकेत दिया था कि उनके हाथों से यह बागडोर उनकी बेटी संभाल सकती है- वह उनकी बेटी होने के कारण नहीं बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के कारण ऐसा कर सकती हैं.

इस साल सात जनवरी को सईद के निधन के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया गया था और विधानसभा को आठ जनवरी से निलंबित अवस्था में रखा गया था.

इसके बाद पीडीपी ने सरकार गठन के लिए भाजपा के साथ अपने गठबंधन के नवीकरण से पहले केंद्र से ‘गठबंधन के एजेंडे’ को लागू करने के लिए एक तय अवधि का आश्वासन मांगा था.

 

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