हम गोमांस हिंदुओं के पाप की वजह से खा रहे हैं

Jul 27, 2016

सुरेंद्रनगर: ‘हिंदुओं के पाप की वजह से ही दलित समाज मृत गाय या मरे जानवरों का मांस खाने को मजबूर हैं।’

यह बात इंडियन गुजरात के सुरेंद्रनगर में जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर मृत गायों को फेंक कर गुस्सा जाहिर करने वाले दलित कार्यकर्ता नटो भाई परमार ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कही।नोसरजन ट्रस्ट से जुड़े नटो भाई परमार वह दलित कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपने साथियों के साथ कलेक्टर कार्यालय के बाहर मृत गायों को फेंकने का फैसला किया था।

दक्षिण गुजरात के मोटे समाधयाला गांव में कुछ दिन पहले चमड़े के एक कारखाने में मरी हुई गाय की चमड़ी उतारने पर चार दलित युवकों की सरेआम पिटाई की गई। तभी से दलित समुदाय में गुस्सा और चिंता पाई जाती है।

इसके विरोध में 18 जुलाई को सुरेंद्रनगर जिले के जिलाधिकारी के कार्यालय के बाहर मरी हुई गाय फेंक कर दलित समुदाय ने अपने गुस्से का एक नया तरीका व्यक्त किया।इस विरोध का शांतिपूर्ण मगर साथ ही उग्र तरीका था जिसे भारत के दलित आंदोलन में एक नये विश्वास के रूप में देखा जा रहा है।

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नटो भाई परमार ने कहा कि ‘मरी गाय का मांस खाने की परंपरा हमने शुरू नहीं की थी। सदियों से हमारे साथ अन्याय और अत्याचार होता रहा है। हमें गांव के बाहर रखा जाता था। जो खुद को हिंदू कहते हैं, उन्हीं के पाप की वजह से हमारे पूर्वज और हम आज भी मरी हुई गाय या मृत पशु के मांस खाने को मजबूर हैं। ‘

उन्होंने कहा कि हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाले दलितों को केवल संख्या बढ़ाने के लिए हिंदू कहते हैं, पर वास्तव में उन्हें हिन्दू नहीं मानते। परमार ने कहा कि हिंदू राष्ट्र की जाति व्यवस्था में दलित सबसे नीचे पायदान पर हैं। परमार के अनुसार अमीताभ बच्चन को कुछ होता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तुरंत ट्वीट करते हैं, पर इतनी बड़ी घटना हो गई और उन्होंने कुछ नहीं किया। वे चुप हैं।

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जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने मरी गाय फेंकने पर नटो भाई परमार कहते हैं कि ‘रैली की अनुमति लेते समय हमने प्रशासन से दस वाहनों को जुलूस में रखने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया कि इन वाहनों में मरी हुई गाय होंगे। हमने कई गांवों से मरी गायें मंगवा कर उन्हें परिसर के सामने फेंक दिया। ‘

परमार कहते हैं कि ‘दलितों ने कहा कि हजारों साल से मरी गाय की खाल निकालकर चमड़े बनाने का काम अब वह नहीं करेंगे और यह काम अब शिव सैनिकों को करने को कहा जाए।’ नटो भाई कहते हैं कि ‘आज भी गुजरात में दलितों की हालत दयनीय है। हमें मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता, हमारे बच्चों को अलग से बिठा कर खाना खिलाया जाता है, सार्वजनिक स्थानों पर हम नहीं जा सकते। कई जगहों पर इसके खिलाफ गुहार लगाई, लेकिन ऐसा करने से बहिष्कार कर दिया जाता है। ‘

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नटो भाई मानते हैं कि मंदिरों में प्रवेश का अधिकार पाने से भी उनका कोई भला नहीं होगा लेकिन वे सवाल करते हैं कि ‘जब समान अधिकार हैं मंदिर में प्रवेश का अधिकार क्यों नहीं दिया जाता? हिंदुओं में तो हम अंतिम स्थान पर हैं। गाय का मांस खाने की परंपरा हमने तो तय नहीं की थी, यह तो जाति व्यवस्था का परिणाम है। हमें यह परंपरा पसंद नहीं है। ‘

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