घाटी का यह विद्रोह पाकिस्तान के लिए चेतावनी है कि बलूचिस्तान अलग हो सकता है – कुलदीप नैयर

Oct 14, 2016
घाटी का यह विद्रोह पाकिस्तान के लिए चेतावनी है कि बलूचिस्तान अलग हो सकता है – कुलदीप नैयर

मैं सर्जिकल स्ट्राइक के पक्ष में नहीं था। सोचता था कि यह मामले को और बढ़ाएगा और शायद ऐसे बिंदु पर ले जाएगा जहां से वापस नहीं लौटा जा सकता, लेकिन अब जब स्ट्राइक हो गई है तो मैं सरकार का समर्थन करता हूं। मुझे प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज बनार्ड शॉ की याद आती है जिन्होंने कहा था कि वे ब्रिटिश सरकार के सबसे मुखर आलोचक हैं, लेकिन चूंकि वह युद्ध में फंसी है, इसलिए उसका समर्थन करते हैं। शायद भारत के पास कोई विकल्प नहीं था। पाकिस्तान की सरजमीं पर पनाह लेने वाले और वहीं से अपनी गतिविधि चलाने वाले आतंकवादियों को सजा देनी ही थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा है कि उनका देश जवाबी कार्रवाई करेगा और शायद बारामूला क्षेत्र के नजदीक हुआ आक्रमण वही बदला था जिसकी बात उन्होंने की थी। इस्लामाबाद ने आतंकवादियों की गतिविधियां रोकने और उसे विफल करने के लिए कुछ नहीं किया। जैसा कि वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने कहा है कि उरी में जो कुछ हुआ, उसका जवाब दिया जा रहा है और

उरी की कार्रवाई अभी पूरी नहीं हुई है। उरी में सेना के शिविर पर आतंकी हमले में 19 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। मैं नहीं समझता कि परमाणु शक्ति से लैस भारत और पाकिस्तान खतरे के निशान को पार करेंगे। सरहद पर तनाव को एक हद तक ही नियंत्रण में रखा जा सकता है, लेकिन यदि घटनाएं हावी हो जाती हैं तो यह कहना मुश्किल होगा कि युद्ध के रंगमंच पर क्या होगा।

दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आपस में चर्चा कर चुके हैं और तनाव कम करने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक से पूर्व ऐसा क्यों नहीं किया? सरताज अजीज को भारत में गुस्से की गहराई का अंदाजा लगा लेना चाहिए था कि सभी विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के समर्थन में थीं। नवाज शरीफ को भी पाकिस्तान की सियासी पार्टियों की सहमति मिल चुकी है। उन्होंने विपक्ष को स्थिति की जानकारी देने के लिए विशेष बैठक बुलाई थी।

दोनों देशों में जनमत लड़ने के पक्ष में हो गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौबत आने पर पाक परमाणु युद्ध तक करने को तैयार है। दोनों देशों के लोग चाहते हैं कि रोज-रोज का तनाव खत्म हो और अपनी-अपनी सरकारों से उम्मीद रखते हैं कि वे सुनिश्चित करें कि लोगों को स्थायी तौर पर इस डर के साथ जीना नहीं पड़े।

दक्षेस यानी सार्क सम्मेलन एक मौका हो सकता था जब आमने-सामने बैठकर मुद्दों पर बातचीत हो सकती थी, लेकिन सभी देशों ने इस्लामाबाद की बैठक का बहिष्कार कर दिया। इनका कहना है कि सार्क सम्मेलन के लिए माहौल सही नहीं है। लेकिन क्या कोई ऐसी जगह नहीं है जहां क्षेत्र के सभी देश मिल सकते और परिस्थितियों पर गहरी चर्चा कर सकते? पाकिस्तान को यह महसूस करना चाहिए कि जो वह कर रहा है, क्षेत्र के अन्य देश उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी पाकिस्तान से खुलेआम अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। भारत मामले को यूएन में ले गया, लेकिन पाकिस्तान के सहयोगी चीन ने वीटो पावर का इस्तेमाल कर यूएन को मसूद अजहर को औपचारिक रूप से आतंकवादी घोषित करने से रोक दिया। यह वीटो पावर का दुर्भाग्यपूर्ण इस्तेमाल है, लेकिन चीन अपने मित्र देश के साथ खड़ा रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस वजह से लोकतांत्रिक भारत को नुकसान पहुंचाने वाला गतिरोध जारी है। हालात कभी भी खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि पाकिस्तानी फौज पीएम नवाज शरीफ को नजरअंदाज करती है। इसका आशय है कि फौज को हरदम सीमा पर जाने की जरूरत नहीं, बल्कि वह निर्वाचित पीएम नवाज शरीफ को अपने रावलपिंडी स्थित मुख्यालय से ही आदेश दे सकती है।

पाकिस्तान को बलूचिस्तान के विद्रोह और अफगानिस्तान से आक्रमण की समस्या से जूझना है। चूंकि दोनों के पीछे कोई संगठित सेना नहीं है, इसलिए सीमित लड़ाई होगी। बेशक अमेरिका ने अपने सैनिक अफगानिस्तान से हटा लिए हैं, लेकिन काबुल के विशेष आग्रह पर एक छोटी टुकड़ी वहां रुकी हुई है।

नई दिल्ली अब बलूच नेता ब्रहमदाग बुगती को खुलकर समर्थन दे रही है, जिन्होंने भारत में शरण के लिए आवेदन किया है। इससे पे्ररित होकर कई बलूची जो फिलहाल यूरोप व दूसरी जगहों में हैं, भारत आना चाहेंगे। इससे पाकिस्तान के खिलाफ एक और मोर्चा खुल सकता है, जिसका इस्तेमाल भारत दुनिया को यह बताने के लिए कर सकता है कि बलूचिस्तान का विद्रोह पूर्वी पाकिस्तान की तरह है जो खुद को आजाद कर 1971 में बांग्लादेश बन गया।

यह विद्रोह पाकिस्तान के लिए चेतावनी है कि बलूचिस्तान अलग हो सकता है। वास्तव में यहां ईरान की तरह शिया बहुमत में हैं और चारों तरफ से घिरे पश्तो क्षेत्र में फिट नहीं बैठते। सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां इस क्षेत्र से थे। जब मैं बरसों पहले उनसे मिला तो उनकी शिकायत थी कि पश्तोभाषी क्षेत्र को स्वतंत्र देश बनाने का अपना वायदा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नहीं निभाया। दरअसल नेहरू मजबूर थे, क्योंकि बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा था और बंटवारे के समय उन्होंने पाकिस्तान की स्थापना को स्वीकार कर लिया था। सीमांत गांधी के नाम से मशहूर बादशाह खां अब पाकिस्तान के नागरिक थे। नेहरू की ओर से उठाया गया कोई भी कदम युद्ध के समान होता और स्वाभाविक है कि वह इसके लिए तैयार नहीं थे।

किंतु मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी तरह के जीव हैं। फिर भी उनकी नीति अभी तक लेन-देन की रही है। वही एक शख्स हैं जिन्होंने अपने शपथ-ग्रहण समारोह में सार्क देशों के सभी नेताओं को बुलाया था। देश में शोर-शराबे के बावजूद अफगानिस्तान से लौटते समय मोदी थोड़ी देर पाकिस्तान रुके थे। लेकिन आज जमीनी स्थिति दूसरी है और यह मोदी को चीजों को अलग नजर से देखने पर बाध्य कर सकती है।

सर्जिकल स्ट्राइक ऐसा ही एक विकल्प है, जिसका इस्तेमाल उन्होंने किया। जवाबी कार्रवाई की नवाज शरीफ की चेतावनी एकदम खराब स्थिति की ओर बढ़ सकती है। यदि हालात और बिगड़े, तो मोदी भी इस पर काबू नहीं पा सकते। घटनाएं अपने तरीके से अपनी बात कहती हैं और उनके अर्थ भी अलग होते हैं। अब भी समय है कि पाकिस्तान अपने को रसातल में जाने से रोक ले, अन्यथा वह चोटी से गिर सकता है। यह उस देश के लिए अत्यंत खतरनाक होगा। आखिरकार पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि तीन युद्धों (1948, 1965 और 1971) को लड़ने के बाद जितना नुकसान वह भारत को पहुंचा सका, उससे कहीं ज्यादा उसका खुद का नुकसान हुआ। यहां तक कि कारगिल की ऊंचाई से हमारे इलाके में घुस आए पाक सैनिकों की वापसी के लिए उसे अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन की मदद लेनी पड़ी थी।

(कुलदीप नैयर, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व ख्यात स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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