हिजामा में 70 बीमारियों का इलाज़, जानिए

Jul 24, 2017
हिजामा में 70 बीमारियों का इलाज़, जानिए

नबी ऐ पाक सल्लाहु अलय्ही वसल्लम जब मेराज़ पर तशरीफ़ ले गए(आसमान पर अल्लाह से मुलाक़ात करने के लिये) तो वहाँ से वापस आते समय सातों आसमान के फरिश्तों में से जिस फ़रिश्ते से भी मुलाक़ात हुई उसने नबी करीम से कहा कि आप अपनी उम्मत को हिजामा कराने का हुक्म दें।

अल्लाह के नबी से सही बुखारी,सही मुस्लिम,सुन्न इब्न माज़ा में कई हदीस हिजामा थेरेपी के बारे में मौजूद हैं कि हिजामा जैसी बहतरीन थेरैपी हमें अल्लाह के नबी की सुन्नत से मिली है,लेकिन इस बारे में पता नही है और बहुत कम लोग ही इससे वाकिफ़ हैं,अल्हम्दुलिल्लाह हमारे गाँव फुलत के एक नोजवान भाई अब्दुल वहाब सिद्दीक़ी की कोशिशों से एक रिवाज़ गाँव में चल पड़ा है,और नोजवान बड़ी तेज़ी से इस सुन्नत की तरफ रागिब होरहे हैं,और सवाब की नियत से हिजामा करा रहे है।

मेडिकल साईंस क्या कहता है इस बारे में?
इलाज में आमतौर पर खून चढ़ाया जाता है, लेकिन हिजामा थेरेपी में शरीर से खून निकालकर बीमारी दूर की जाती है। सालों पुरानी इस पद्धति को कपिंग थेरेपी भी कहते हैं। माइग्रेन, जॉइंट पेन, कमर दर्द, स्लिप डिस्क, सर्वाइकल डिस्क, पैरों में सूजन, सुन्न होना और झनझनाहट जैसी बीमारी का इलाज मिनटों में संभव है। इस इलाज में दवा की जरुरत नहीं होती है। सालों पुरानी इस पद्धति से लोग अनजान हैं, यहां तक कि डॉक्टर भी इसके बारे में कम जानते हैं। इसकी थ्योरी यह है कि शरीर में कई बीमारी की वजह खून का असंतुलन होता है। हम कपिंग थेरेपी के जरिए इस ब्लड को बैलेंस कर देते हैं और बीमारी ठीक हो जाती है और पेशंट को जल्द आराम मिल जाता है

कपिंग के लिए एनाटॉमी और फीजियोलॉजी की समझ होनी चाहिए। बीमारी के अनुसार गर्दन या गर्दन के नीचे या पीठ में कपिंग की जाती है। कपिंग के लिए शीशे का कप यूज करके वैक्यूम पैदा किया जाता है ताकि कप बॉडी से चिपक जाए। अब इसके लिए मशीन का यूज किया जाने लगा है। जिस पॉइंट पर बीमारी की पहचान होती है, वहीं पर कपिंग की जाती है। कपिंग करने के तीन से पांच मिनट बाद असंतुलित खून जमा हो जाता है। जमा हुए खून को निकाल दिया जाता है। अगर बीमारी शुरुआती हो तो दो सीटिंग में बीमारी खत्म हो जाती है, वरना तीन-चार सीटिंग की जरुरत होती है। हिजामा थेरेपी प्राकृतिक चिकित्सा की सबसे पुरानी पद्घति है। समय के साथ-साथ हम इस पद्घति को भूलते चले गए। अब समय आ गया है कि फिर से हिजामा थेरेपी को जिंदा किया जाए।

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