11 साल से श्मशान में नौकरी कर रही यह महिला, ईसाई होकर भी पूरे विधान से कराती हैं हिंदुओं का दाह संस्कार

Jan 20, 2018
11 साल से श्मशान में नौकरी कर रही यह महिला, ईसाई होकर भी पूरे विधान से कराती हैं हिंदुओं का दाह संस्कार

पिछले 11 सालों से केरल की एक ईसाई महिला हिन्दुओं के श्मशान में पूरे रीति-रिवाजों से हिंदुओं का दाह-संस्कार करवाती आ रही हैं। अब आप ये सोच कर हैरान हो रहे होंगे कि हम एक श्मशान में दाह-संस्कार करवाने वाली महिला की बात क्यों कर रहे हैं। तो आइये हम आपको बता दें कि हिन्दुओं के श्मशान में पूरे रीति-रिवाजों से हिंदुओं का दाह-संस्कार करवाने वाली ये महिला हिन्दु नहीं बल्कि एक ईसाई है।

इस महिला का नाम सेलिना बताया जा रहा है। जो लोगों के बीच एक बड़ी मिसाल पेश कर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 52 वर्षीय सेलिना हिंदुओं के सभी रिवाजों को अच्छे से जानती हैं, जिसकी मदद से वह आसानी से दाह संस्कार करवा पाती हैं। इस बारे में सेलिना ने बताया कि, “इसके लिए दिमाग को मजबूत होने की आवश्यकता है। एक महिला जिस प्रकार की भी नौकरी करना चाहे वह कर सकती है। मैंने सुबह के तीन बजे तक शवों का दाह संस्कार कराया है और मैं इससे कभी नहीं डरी।”

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सेलिना ने इस बारे में आगे बताया कि “मैं जब दो साल की थी तब मैंने अपनी मां को खो दिया था। लेकिन जब मैं 12 साल की हुई तो मेरे पिता और आंटी की आंखो की रोशनी चली गई। और हाल ये हुआ कि घर चलाने के कारण मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। और 22 साल की उम्र में मेरी शादी दिहाड़ी पर काम करने वाले एक मजदूर के साथ हो गई। शादी के बाद मैंने सोचा था कि मेरी जिंदगी संवर जाएगी लेकिन ये मेरा सिर्फ सोचना था क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह शराब पीकर घर आता और मेरे साथ मारपीट करता था। मेरी दोनों बेटियां यह सब देखते हुए बड़ी हुई हैं। मेरा पति अक्सर घर छोड़कर भाग जाता था और बहुत से कर्ज के साथ वापस लौटता। पिछली बार 19 साल पहले वह घर छोड़कर गया था और तबसे वापस घर ने नहीं आया है।”

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उन्होंने अपनी ज़िन्दगी से जुड़ी कई और बातें बताई उन्होंने कहा कि “घर चलाने के लिए मैंने दिहाड़ी पर काम करना शुरु किया लेकिन इससे घर नहीं चल पा रहा था, इसलिए मैंने दाह-संस्कार करने वाले व्यक्ति के मददगार के रूप में काम करना शुरु किया। इसके बाद मुझे काम आ गया और फिर में भी इस कार्य को करने लगी। एक शव का दाह-संस्कार करने का मुझे 1,500 रुपए मिलता है जिसमें से 405 रुपए नगरपालिका को देना होता है। इससे मुझे बहुत ही कम लाभ मिलता है क्योंकि नारियल के गोलों और लकड़ी के लिए मुझे इसी रकम में से पैसा खर्च करना पड़ता है। नवंबर-दिसंबर में बहुत ही कम शव जलने के लिए आते हैं।” जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन कर रही सेलिना ने आखिरी में कहा “मुझे नहीं पता भगवान ने मदद क्यों नहीं की।”

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