उनकी नस्ल ‘देशभक्ति के सर्टिफ़िकेट’ बांट रही है, जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी कर उनके तलवे चाटे हैं!

Aug 14, 2017
उनकी नस्ल ‘देशभक्ति के सर्टिफ़िकेट’ बांट रही है, जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी कर उनके तलवे चाटे हैं!
इतिहासकार कहता है कि आज़ादी से पहले अंग्रेज़ एक बार भी अपने तलवों में ज़हर लगा लेते तो कथित देशभक्तों के सभी परिवार का ख़ात्मा हो जाता…!
कल हम देश में जश्न ए आज़ादी की 71वीं सालगिरह मना रहे होंगे, हमारे देश को अंग्रेज़ो के चंगुल से आज़ाद हुए सत्तर साल हो चुके हैं। हम जश्न ए आज़ादी इसलिए मना रहे हैं कि इस देश की आज़ादी की ख़ातिर हमारे पुरखों ने बेशुमार क़ुरबानियाँ दी हैं, देश का ज़र्रा ज़र्रा हमारे लहू से लाल है, इस शबिस्तान ए चमन को पानी से ज़्यादा हमारे असलाफ़ ने अपने ख़ून से सींचा और हराभरा रखा है, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अलम ए बग़ावत हमारे पुरखों ने ही बुलन्द किया, शेर  बंगाल नवाब सिराजुद्दौला से टीपू सुल्तान तक एक लम्बा सिलसिला है, जिन्होंने अंग्रेज़ों को मैदान ए कारज़ार में आने पर मजबूर किया और अपनी शुजाअत और बहादुरी का एहसास कराया, अंग्रेज़ों को इस बात से पूरी तरह वक़्फ़ियत थी कि हम इन बहादुर और शेर दिल लोगों का मुक़ाबला मैदान ए जंग में करने से रहे। चुनांचे उन्होंने जागीरदारी का लालच दे कर मीर जाफ़र और मीर सादिक़ पैदा किए और मक्कारी और फ़रेब का जाल बुनना शुरू किया, और इसके नतीजे में कुछ बहादुरों को जाम ए शहादत पीना पड़ा। बात यहीं ख़त्म नहीं हो गयी बल्कि उन बादशाहों की शहादत के बाद मुसलमानों में जज़्बा ए आज़ादी और भड़क उठा, वो पहले से ज़्यादा तैयारी के साथ मैदान ए कारज़ार में निकले, इस बार मुसलमानों की जमाअत अकेली नहीं थी बल्कि देश की ख़ातिर बिरादरान ए वतन के राजा महाराजा, साधू सन्त भी इस जंग का हिस्सा बने और धीरे धीरे पूरे देश में बग़ावत की आग फैल गयी, हर व्यक्ति ने अपने दिल में इसकी तपिश महसूस की, एक ऐसी आग जिसने हिन्दू मुस्लिम दोनों को एक दूसरे के लिए बाज़ू साबित बना दिया और 1857ई० में बहादुर शाह ज़फ़र की क़यादत में आज़ादी की लड़ायी लड़ी गयी, लेकिन अफ़सोस सभी कोशिशों के बावजूद अंग्रेज़ों ने इस जंग को अपने पलड़े में डाल लिया और फिर यहाँ से ज़ुल्म व तशद्दुद का वह दौर शुरू हुआ कि जिसे लिख कर और सुन कर कलेजा मुंह हो आने लगता है, आंखें नम हो जाती हैं, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती हैं, अंग्रेज़ों ने एक काउंटडाउन शुरू किया, जिस के नतीजे में देश के चप्पे चप्पे से हर उस आदमी को फाँसी पर लटका दिया गया जिसके बारे सिर्फ़ यह शक था कि वो 1857ई० की जंग ए आज़ादी में शामिल था। इन दिनों में मुस्लिम जनता के अलावा 54 हज़ार उलमा ए किराम को फांसी के तख़्ते पर चढ़ाया गया, ऐसी नस्ल कुशी और इतने सख़्त हालात में भी मुसलमानों ने जज़्बा ए आज़ादी को सर्द होने नहीं दिया और फिर शैखुल हिन्द ने तहरीक रेशमी रुमाल के ज़रिए अंग्रेज़ो को निस्त व नाबूद करने, इस देश से भगाने का प्लान तैयार किया, शैखुल हिन्द ने अपने शागिर्दों से कमांडरों वाला काम लिया और उन्हें जंग की तैयारी के लिए दुनिया के अलग अलग देशों में रवाना किया लेकिन अफ़सोस कि यह तहरीक मुक्कमल न हो सकी और वक़्त से पहले शैखुल हिन्द की गिरफ़्तारी अमल में आ गयी जिसके नतीजे में आप को माल्टा की जेल में क़ैद किया गया। तहरीक रेश्मी रुमाल की नाकामी के बाद मुसलमानों ने बिरादरान ए वतन के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ महाज़ क़ायम कर दिया और आख़िर में लाखों लोगों की शहादत के बाद 1947 में हिन्दुस्तान को अंग्रेज़ साम्राज्यों से आज़ादी मिली। लेकिन अंग्रेज़ इस देश से जाते जाते देश को दो बड़े ज़ख़्म दे गया एक बंटवारा और एक हिन्दू मुस्लिम मुनाफ़रत…!
ज़मीन भी बंटी ज़हन भी बंटे, ये दो ज़ख़्म ऐसे नासूर बने के राष्ट्रीय एकता का गहवारा, अमन व शान्ति का अलम्बरदार हिन्दुस्तान आज आज़ादी के सत्तर साल होने के बाद भी नफ़रत व तअस्सुब की आग में जल रहा है, अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भी नफ़रत में कमी नहीं आयी, बल्कि अब तो नफ़रत के बल पर सियासत की रोटियाँ सेंकी जाती हैं। अंग्रेज़ों ने जिस बीज को देश के हिन्दू मुसलमानों के बीच बोया था, वो आज घना पेड़ का रूप धारण कर चुका है, महात्मा गांधी को मारने वाले गोडसे के पैरोकार देश की गंगा यमुना संस्कृति को मिटाने पर तुले हुए हैं, ग़लत वाक़्यात व रवायात मनघड़ंत बातों के ज़रिए नौजवान नस्ल की ज़हनों में नफ़रत की आग भड़काई जा रही है, और उन्हें इस बात पर उकसाने की कोशिश की जा रही है कि ये देश सिर्फ तुम्हारा है, यहाँ के मुसलमान और ईसाई दूसरी जगह से आ कर बसे हैं, ये शरणार्थी हैं, रिफ्यूजी हैं। इस लिए उनको यहाँ से निकालना बेहद ज़रूरी है, ताकि दोबारा तुम्हारी सरकार हो सके, अखण्ड भारत और हिन्दू राष्ट्र जिसका ख़्वाब तुम्हारे पुरखों ने देखा था उसकी ताबीर यहाँ के मुस्लिम ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए बाज़ाबता उन्हें तैयार किया जा रहा है, उन्हें असलहे की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वो हर जगह बिना किसी वजह के तशद्दुद को रवा रखें और अगर क़ानून की नज़र में आ जाएं तो अपनी पॉवर अपनी ताक़त और अपनी पहुँच का इस्तेमाल कर के उन्हें बेगुनाह साबित करने की कोशिश करते हैं। जो देश कभी दुनिया का सबसे बड़ा गणतन्त्र जाना जाता था आज वो देश पूरी दुनिया में “मोब लीचिंग” के लिए मशहूर हो गया है, जहाँ के न्यायपालिका न्याय के लिए मशहूर थी अब वो ख़ामोश तमाशाई बन कर फ़िरक़ापरस्त हुकूमत के आगे सिपर डाल चुकी है। पूरे देश में एक आग लगी हुई है और उसमें तेल छिड़कने का काम हमारे सियासतदां अंजाम दे रहे हैं, जो इलेक्शन में तरक़्क़ी के नाम पर वोट तो मांगते हैं लेकिन इलेक्शन के बाद अल्पसंख्यकों के ख़ून चूस रहे हैं। चारों तरफ़ से अल्पसंख्यकों को परेशान किया जा रहा है, हिन्दू राष्ट्र के नाम पर ब्राह्मणवाद को बढ़ावा मिल चुका है। दलितों के साथ फिर वही सदियों पुराना छूत छात का सिलसिला शुरू हो गया है। मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ क़रार दिया गया है अब ज़रख़रीद ग़ुलाम बन चुका है नॉन इशू को इशू बनाना इसका सबसे पसंदीदा काम है। ग़लत रिपोर्ट और बेजा इल्ज़ाम तराशी मीडिया का तरीक़ा है ऐसे में अब हम कैसे कह सकते हैं कि हम आज़ाद हैं ? हम किस चीज़ से आज़ाद हैं ? हमारे बच्चों को स्कूल में वन्दे मातरम पढ़ने पर मजबूर किया जाए। क्या यही आज़ादी है ? उप-राष्ट्रपति के बयान को उसके पद को देखते हुए नहीं एक मुसलमान होने के नाते देखा जा रहा है ? उनके बयान पर भगवा संगठन जले हुए हैं ? क्या उन्होंने ने ग़लत कहा है ? अल्पसंख्यकों में जो डर व ख़ौफ़ है उसी को तो उन्होंने बयान किया है। क्या उन्हें इस बात का हक़ नहीं है कि वो अपने मन की बात कह सकें ? क्या उन्हें इस चीज़ की आज़ादी नहीं है, सिर्फ़ उन्हें ही आज़ादी है जिनके असलाफ़ ने हमेशा अंग्रेज़ों की ग़ुलामी की है। उनके तलवे चाटे और आज उनकी नस्ल ‘देशभक्ति के सर्टिफ़िकेट’ बांट रही है क्या वो इस देश के वास्तविक नागरिक हैं ? क्या वही लोकतंत्र के रक्षक हैं ? नहीं ऐसा नहीं है। हम भी आज़ाद हैं और हमें भी उतना ही हक़ है जितना बिरादरान ए वतन को हक़ है। हम इस देश मे उसी शान व शौकत से रहेंगे जिस तरह हमारे असलाफ़ ने ज़िन्दगी गुज़ारी। हमें छेड़ा न जाए हम उसी क़ासिम व महमूद की औलाद हैं जिन्होंने शामली में मैदान ए कारज़ार गर्म किया था। हमारे ख़ून में भी वही जज़्बा हुर्रियत है, हमने हर दौर में बातिल का मुक़ाबला किया है और ज़रूरत पड़ी तो अब भी फिरक़ापरस्तों से लोहा लेंगे। ऐसा नहीं कि पूरा देश हिन्दू राष्ट्र विचारधारा का समर्थक है अब भी बिरादरान ए वतन की अधिक संख्या इस बात पर सहमत है कि हिन्दुस्तान की बक़ा और लोकतन्त्र की बक़ा इसी में है कि यहाँ हिन्दू मुस्लिम एकता से रहें। और हम यही कोशिश कर रहे हैं कि हिन्दुस्तान की गंगा यमुना संस्कृति बरक़रार रहे। इस के लिए दोनों फ़िरक़ों के लीडरों को राष्ट्रीय स्तर पर उठ काम करना चाहिए, और बहुत से लीडर ये काम कर रहे हैं, और इन’शा’अल्लाह जल्द ही उसके नतीजे ज़ाहिर होंगे।
नाज़िश हुमा क़ासमी
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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