मुसलमान पर जितना शक करोगे , मुसलमान उतना ज्यादा खतरनाक बनेगा : डा. राम मनोहर लोहिया

Mar 25, 2016
वाराणसी. डा. राम मनोहर लोहिया, जिसने क्या कुछ नहीं दिया इस देश को। उनका चिंतन, जो आज भी तब से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। आज लोग इसी भारत में हिंदू-मुस्लिम का भेद करते हैं। इस समय तो इसकी हवा कुछ ज्यादा ही तेज है। पर जानें लोहिया का मत क्या था, लोहिया कहते हैं, इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि हिंदुस्तान के मुसलमान तो आखिर हिंदू का भाई है। लेकिन इसके लिए रिश्ता बनाना पड़ेगा, क्योंकि रिश्ता ही नहीं तो उसकी अहमियत क्या जानेंगे। दरअसल हकीकत को जान जाएंगे तो कभी एक-दूसरे को गाली नहीं देंगे। कारण यह है कि जिन 700-800 साल की गलतफहमी दोनों के मन में पैठ कर गई है वही गलत है। असलियत तो यह है कि इन 700-800 साल में मुसलमान को मुसलमान ने मारा है। ये कोई रुहानी अर्थ में नहीं, बल्कि जिस्मानी अर्थ में मारा है। वह बताते हैं तैमूरलंग आता है, चार-पांच लाख लोगों का कत्ल करता है, जानते हैं उसमें से तीन लाख मुसलमान होते हैं। लोहिया कहते हैं कि यह बात अगर मुसलमानों के घर-घर पहुंच जाए कि कभी मुगल मुसलमान ने पठान मुसलमान का कत्ल किया तो कभी अफ्रीकी मुसलमान ने मुगल मुसलमान का तो पिछले 700 सालों का इतिहास लोगों को समझ आने लगेगा। दरअसल यह हिंदू – मुसलमान का मामला नहीं, यह तो देशी –परदेशी का मामला है।
रजिया, शेरशाह, जायसी को क्यों नहीं पढ़ाते
लोहिया कहते हैं कि हर हिंदू और हर मुसलमान को रजिया, शेरशाह, जायसी के बारे में क्यों नहीं बताया जाता। वह कहते हैं कि इन तीनों को मैं अपने माता-पिता में गिनता हूं। वह कहते हैं कि हर भारतीय को यह समझना होगा कि गजनी, गोरी, बाबर सब लुटेरे थे, हमलावर थे। यह दोनों जुमले साथ-साथ हों तो हंदू और मुसलमान दोनों ही गजनी, गोरी और बाबर बराबरके हमलावर और लुटेरे ही समझ आएंगे। ये सारे देश के लिए समान रूप से हमलावर और लुटेरे थे। इनकी जगह रजिया, शेरशाह और जायसी हमारे पुरखे थे। वह कहते हैं कि अगर 700 साल को देखने की यह नजर बन जाए तो फिर हिंदू और मुसलमान दोनों पिछले सालों को अलग-अलग निगाह से नहीं देखेंगे। लड़ाई करने वाली निगाह से नहीं देखेंगे। वे देखने लग जाएंगे जोड़ने वाली निगाहों से।
इस्लाम मोहम्मद साहब से है, गजनी-गोरी से नहीं
डॉ. लोहिया आम इंसान नहीं थे। जितना उन्हें गीता का ज्ञान था उतना ही कुरान और बाइबिल का। इसीलिए तो वह कहते हैं कि इस्लाम मोहम्मद साहब से है न कि गजनी या गोरी से। वह कहते हैं कि कोई भी देश तब तक सुखी नहीं हो सकता जब तक अल्पसंख्यक सुखी न हों। लोहिया का मानना है कि मुसलमानों के अंदर ज्यादातर लोग पिछड़े हैं. मसलन जुलाहे, धुनिये। तब के 15 करोड़ में ये चार, साढ़े चार करोड़ मुसलमान हैं। उन्हें अहमियत देने की जरूरत है। उनकी पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है। लेकिन उसी तरह से दलित, आदिवासी भी हैं। जब तक ये सुखी नहीं होते हिंदुस्तान सुखी नहीं हो सकता।
बड़ी बात, हिंदू-मुसलमान का मन जोड़ पाए तो भारत-पाकिस्ता को जोड़ पाएंगे
डॉ. लोहिया की सोच कितनी दूर तलक थी इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि वह कहते हैं कि अगर हम भारत के हिंदू-मुसलमान के मन को जोड़ पाए तो शायद हम हिंदुस्तान-पाकिस्तान को जोड़ने का सिलसिला भी शुरू कर देंगे। ऐसा वह इसलिए कहते हैं क्योंकि वह दिल से भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को स्वीकार नहीं कर पाते।
हिंदू जितना मुसलमान पर शक करेगा, मुसलमान उतना ज्यादा खतरनाक बनेगा
लोहिया बताते हैं कि एक बात तो तय है कि हिंदू जितना ज्यादा शक करेगा, मुसलमान उतना ही ज्यादा खतरनाक बनेगा। हिंदू जितना सद्भावना और प्रेम से बर्ताव करेगा, मुसलमान उतना ही कम खतरनाक होगा। वह कहते हैं हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान दोनों ही सरकारें निकंम्मी हैं। मामूली सी बात पर दोनों सरकारें एक-दूसरे देशों के निरीह लोगों को परेशान करती हैं। उन्हें जासूस मानती हैं, उन्हें प्रतिड़त करती हैं।
हिंदू हो या मुसलमान दोनों का मन तो वोट ने बांट रखा है
लोहिया कहते हैं कि हिदूं हो या मुसलमान दोनों का मन तो वोट ने बांट रखा है। ये वोट मांगने वाले वोट मांगते समय हमेशा इस बात का खयाल रखते हैं कि ऐसा कुछ न जुबां से निकल जाए कि सुनने वाला नाराज हो जाए। नतीजा हिंदुस्तान में जितनी भी पार्टियां हैं वे हिंदू-मुसलमान को बदलने की बात नहीं करतीं। मन में जितना कूड़ा है, जो गलतफहमी है, जो भ्रम है उन्हीं को तसल्ली दे कर वोट लेना चाहती हैं। नतीजा हिंदू और मुसलमान के मन में जो खराब है वह वैसे ही रह जाता है। जरूरत उस खराब मन को बदलने की है।

 

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