सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई और केंद्र सरका को लगाई कड़ी फटकार

Apr 13, 2016

सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के डूबे कर्ज पर आरबीआई और केंद्र सरकार को मंगलवार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि आखिर किस तरह से लोग और कंपनियां बैंकों का करोड़ों रुपए का कर्ज बिना चुकाए देश से बाहर भाग जाते हैं.

शीर्ष अदालत की ओर से यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें हाल में एक समाचार पत्र में आरटीआई के हवाले से छपी इस खबर पर कि 29 सरकारी बैंकों ने 2013 से 2015 के बीच करीब 2.11 लाख करोड़ रुपए के कर्ज के मामलों को बंद कर दिया है. स्वत: संज्ञान लेते हुए उसने आरबीआई से उन कंपनियों और व्यक्तियों की सूची सौंपे जाने को कहा था, जिनपर सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों का 500 करोड रुपए या उससे ज्यादा का कर्ज बकाया है.

मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरबीआई की ओर से ऐसे लोगों की दो सप्ताह पहले सौंपी गई सूची पर मंगलवार को वित्त मंत्रालय और इंडिया बैंक एसोसिएशन को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि कर्ज चूककर्ताओं से वसूली के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं. न्यायालय ने आरबीआई से सख्त लहजे में कहा कि एक नियामक के रूप में उसकी यह जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे मामलों पर वह सख्त निगरानी रखे. इस मामले में आरबीआई को भी पक्षकार बनाया गया है.

न्यायालय ने कहा कि 15-20 हजार के कर्ज लेने वाले किसानों से इसे वसूल करने के सभी उपाय किए जाते हैं, जबकि हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लेने वाले अपनी कंपनियों को दीवालिया बता कर विदेशों में मौज उड़ा रहे हैं. मामले की अगली सुनवाई 26 अप्रैल को होगी. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कारोबारियों और कंपनियों द्वारा हजारों करोड़ रुपए का कर्ज नहीं चुकाना संदेह पैदा करता है,

इसपर आरबीआई की ओर से ऐसे लोगों की सूची सार्वजनिक नहीं किए जाने की बात की जा रही है. न्यायालय ने कहा कि वह इन नामों को सार्वजनिक किए जाने पर विचार कर सकता है. शीर्ष अदालत ने हुडको में कर्ज चूककर्ताओं से संबधित  एक घोटाले को लेकर वर्ष 2005 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं. वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की ओर से दायर की गई इस याचिका में कहा गया था कि हर साल देश में करोड़ों रुपए के कर्ज चूककर्ताओं का मामला यूं ही बंद कर दिया जाता है.

 

न्यायालय ने देश में डूबे कर्ज की राशि लगातार बढ़ने पर गहरी चिंता जताते हुए 16 फरवरी को हुई पिछली सुनवाई में आरबीआई को छह सप्ताह के भीतर उन कंपनियों और व्यक्तियों की सूची उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था जिनपर 500 करोड़ रु. से अधिक का कर्ज बकाया है और जिसे वे चुका नहीं रही हैं. शीर्ष अदालत ने यह भी जानना चाहा था कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने किस प्रकार से उचित दिशा-निर्देशों का पालन किए बगैर इतनी बड़ी राशि कर्ज  में दी.

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