सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश, कहा- अलग धर्म के आदमी से शादी कर लेने से नहीं बदलता पत्नी का धर्म

Dec 08, 2017
सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश, कहा- अलग धर्म के आदमी से शादी कर लेने से नहीं बदलता पत्नी का धर्म

दूसरे मजहब में शादी करने वाली महिलाओं को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट एक बहुत ही अहम बयान दिया है। सुप्रीम कोर्ट अहम बयान में कहा कि शादी के बाद पत्नी का धर्म बदलकर पति के धर्म के अनुसार हो जाए ऐसा कोई कानून नहीं है। और दूसरे धर्म में शादी करने मात्र से ही पत्नी का धर्म नहीं बदल जाता। बल्कि शादी के बाद महिला की व्यक्तिगत पहचान और उसका धर्म तब तक बना रहता है जब तक महिला खुद अपना धर्म परिर्वतन न कर ले।

बता दें कि ये मामला उस समय सामने आया जब एक पारसी महिला के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की कान्स्टीट्यूशन बेंच ने कहा कि अगर कोई महिला दूसरे मजहब के मानने वाले शख्स से शादी करती है तो उसका धर्म नहीं बदल जाएगा। क्योंकि इस तरह का कोई कानून हमारे देश में नहीं है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गुलरुख एम. गुप्ता नाम की पारसी महिला ने एक हिंदू शख्स से शादी की। जिसके बाद वो अपने पैरेंट्स के अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहती हैं। लेकिन, वलसाड पारसी बोर्ड इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। इसी मामले की सुनवाई साल 2010 में गुजरात हाईकोर्ट में हुई थी। उस समय हाईकोर्ट ने ये कहा था कि ‘अगर पारसी महिला किसी हिंदू से शादी करती है तो उसका मजहब वही हो जाएगा जो उससे शादी करने वाले शख्स का है।’ इस लिहाज से पारसी महिला अंतिम संस्कार के लिए पारसियों के ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ में जाने का हक खो देगी। महिला ने कहा कि अगर कोई पारसी पुरुष दूसरे मजहब की महिला से शादी करता है तो उसके पारसी हक नहीं छीने जाते, लेकिन फिर ऐसी क्या वजह है कि एक पारसी महिला के साथ ये क्यों किया जाता है।

इस मामले पर कहा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं जिसके तहत एक मजहब की महिला अगर दूसरे मजहब के शख्स से शादी करती है तो उसका पहला मजहब छूट जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारे यहां स्पेशल मैरिज एक्ट है। और ये इजाजत देता है कि दो अलग मजहबों के लोग शादी के बाद भी अपनी-अपनी धार्मिक पहचान कायम रख सकते हैं। इस बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस एके. सीकरी, जस्टिस एएम. खानविलकर, जस्टिस डीवाय. चंद्रचूढ़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं।

बता दें कि महिला की तरफ से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंग ने कॉमन लॉ डॉक्ट्रिन का हवाला देते हुए कहा कि “इसके मुताबिक तो गैर मजहब में शादी करने के बाद महिला का धर्म अपने आप बदल जाता है।” उन्होंने आगे कहा “क्या हम कॉमन लॉ डॉक्ट्रिन को भारत में लागू कर सकते हैं जबकि ये उसी देश में नहीं है जहां से इसकी शुरुआत हुई?” इसके बाद उन्होंने इसकी पूरी तरह से जांच की मांग भी की। उन्होंने कहा ‘मेरे हिसाब से तो ऐसी कोई प्रथा नहीं है। अगर है भी तो ये संविधान की व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाती है।’

जिसके बाद बेंच ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “एक शख्स अगर दूसरे मजहब में शादी करता है तो समाज उसे अपना मजहब मानते रहने की इजाजत देता है। फिर क्यों, दूसरे मजहब में शादी करने वाली महिला को अपनी पहली धार्मिक पहचान रखने की इजाजत नहीं है। एक महिला को इस मामले में कैसे रोका जा सकता है?” बेंच ने साफ तौर पर इस बात को लेकर कहा कि “ये एक महिला का हक है कि वो ये तय करे कि वो किस मजहब को मानना चाहती है।”बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई को 14 दिसंबर को करने की बात करते हुए कहा कि “इस दिन वलसाड बोर्ड ट्रस्ट का पक्ष भी सुना जाएगा।”

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