स्कूल मे मिले खाने से अंडे को छुपाकर, अपनी टीबी से पीड़ित मां के लिए रोज़ लाता है ये मासूम

Jun 17, 2016

वह रोज़ सुबह उठता है. आंख मीचते अपनी मां की उन पीली पड़ी आंखों में उसकी बेबसी को देखता है. उसकी उम्र ज़िद करने की है, खाने-पीने की चीजों के लिए मां को परेशान करने की है, पर वो आम बच्चा नहीं है. वो अपनी मां के लिए बहुत कुछ करना चाहता है, बहुत कुछ नहीं तो कुछ तो ज़रूर करना चाहता है, लेकिन उसकी उम्र उसे ये करने की इजाज़त नहीं देती. वह चाहता है अपनी गरीबी को दूर करना. वह चाहता है मां के दुख को दूर करना. वह चाहता है बीमार मां का अच्छे से इलाज करवाना, लेकिन वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि वह बस 9 वर्ष का ही तो है. आखिर वह कर भी क्या सकता है.

उसकी मां किसी आम बीमारी से पीड़ित नहीं है. गरीब के लिए तो सर्दी-बुखार भी कैंसर जैसा होता है और यहां तो उस 9 साल के मासूम बच्चे की मां को टीबी है. हां टीबी. किसी गरीब से एक बार पूछ लेना कि टीबी का दर्द क्या होता है. समझ आ जाएगा. वो चाहता है कि उसकी मां टीबी से जल्द ही रोग मुक्त हो जाए. पर उसकी भी अपनी बेबसी है. उसकी भी अपनी लाचारी है.

झारखंड के गोड्‌डा जिला के पांडुबथान सरकारी विद्यालय की कक्षा तीन में पढ़ने वाले अमित कोड़ा को नहीं पता कि मदर्स डे क्या होता है. उसे यह भी नहीं पता कि टीबी रोग क्या है. उसे तो बस इतना पता है कि उसकी मां बहुत बीमार है और उसकी गरीबी ने उसे और भी बीमार कर दिया है. यह मासूम बच्चा इतना ज़रूर जानता है कि उसकी मां के लिए अंडे खाना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. टीबी मरीज सावित्री की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि वह पौष्टिक आहार ले सके, जबकि डॉक्टरों ने इन्हें खाने को कहा है. पर इस गरीब के लिए जब दो वक़्त की रोटी जुटाना ही पत्थर तोड़ने से कम नहीं, तो वो अंडे कहां से खा सकेगी.
जिसकी ज़िंदगी गरीबी, लाचारी, तंगी और बीमारी में कट रही हो, उसे अपने लिए अंडे खाना कैसे मुनासिब लग सकता है. लेकिन यह बच्चा अपने मां को इस हालत में नहीं देख सकता. वो अब ऐसे ही हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता. उससे जो बन पड़ेगा, वो अपनी मां की सेहत के लिए ज़रूर करेगा. मां की हालत ने उसे स्कूल में मध्याह्न भोजन में मिलने वाले अंडे को छिपाकर घर लाने की युक्ति सुझाई. अमित की मां को अंडे मिल सकें, इसलिए वो स्कूल में मिड-डे मील में मिलने वाले अंडे को हर सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को छुपा कर मां के लिए लाता है.
‘जब मां ठीक हो जाएगी तो मैं अंडा खाने लगूंगा’ यह कहना किसी बच्चे के लिए दिलेरी से कम नहीं, जबकि वो जानता है कि वह खुद एक बच्चा है.
वह बच्चा ज़रूर है, लेकिन सोच आज के समाज के बेटों से काफी ऊपर है. आज जो बेटे अपनी मां को उनकी हालत पर छोड़ देते हैं और अपनी आभाषी दुनिया में मस्त हो जाते है, उन सभी बेटों को इस मासूम बच्चे से कुछ न कुछ ज़रूर सीखना चाहिए. वो खुद के हिस्से के अंडे को इसलिए नहीं खाता है, क्योंकि जब वो खा लेगा तो उसकी मां के लिए अंडे कहां से आएंगे. उसकी मां कैसे ठीक हो पायेगी.

नौ साल के इस बच्चे की अब सिर्फ़ एक ही चिंता है कि अंडा खाकर उसकी मां टीबी से मुक्त हो जाए, ताकि ममता की छांव उसे बराबर मिलती रहे. वह कहता है, ‘अगर मां ही नहीं रहेगी तो मुझे स्कूल कौन भेजेगा? जब मां ठीक हो जाएगी तो मैं अंडा खाने लगूंगा.’ जितना प्यार वो अपनी मां से करता है, मां भी उसे उतना ही प्यार करती है. वो जब भी मां को अंडा खिलाता है, उसकी मां आधा अंडा उसे खिलाने की ज़िद करती है, पर वो बच्चा अपनी मां की बात नहीं मानता नहीं और माने भी कैसे?
मां सावित्री की चार बेटियों- कविता, रेणु, बबिता और पूजा में से अमित इकलौता बेटा है. सावित्री टीबी की दवा डॉट्स के माध्यम से खा रही है. सावित्री घर में अक्सर बोलती, ‘भरपेट भोजन के लिए ही रुपये नहीं है तो अंडा आखिर कहां से खरीदेंगे?’ मां की यह बात अमित को रोज भेदती है लेकिन वह सोचकर भी मां के लिए कुछ नहीं कर पाता. लेकिन सच तो ये है कि वो अपनी मां के लिए जितना कर पा रहा है, उतना भी कर पाना आज के किसी बेटे के लिए संभव कहां रह गया है.

ये बच्चा हमारे असंवेदनशील समाज के उन कपूत बेटों के लिए प्रेरणा ही है, जो अपनी मां को उनकी हाल पर जीने के लिए छोड़ देते हैं. इस मासूम बच्चे के इस जज़्बे को ग़ज़बपोस्ट की टीम दिल से सैल्यूट करती है.

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