भारत के प्रधानमंत्री ने छिपाई मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बातें…

May 19, 2017
भारत के प्रधानमंत्री ने छिपाई मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बातें…

हम समझते है कि हमारे राजनेता खासकर जिम्मेदार पदों पर बैठें नेता अवाम को हर सच्चाई से अवगत करते है लेकिन हाल कि खबरों को आधार माने तो शायद यह सच न लगे।

काबिलेगौर हो कि बीते दिनों जमियत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद उस्मान मंसूरी की अगुआई में मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेताओं का एक प्रतिनिधि मंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला था। इस मौके पर उनने पीएम को एक ज्ञापन भी सौंपा था।

प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात करने वाले इस प्रतिनिधि मंडल में मुख्य रूप से जाहिर काजी, अध्यक्ष अंजुमन-ए-इस्लाम, महमूद मदनी महासचिव जमीअत उलेमा ए हिन्द , अख्तरुल वासे वाइस-चांसलर मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी जोधपुर, सांसद मौलाना बदरुद्दीन सहित करीब एक दर्जन बुद्धिजिवी शामिल थे। ये मुलाकात मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच चौड़ी होती खाई को पाटने के लिए की गयी थी।

इस दौरान हुई बातचीत में गौरक्षा और लव जिहाद के नाम पर हो रही हिंसाओं से उपजे भय के वातावरण पर विशेष तौर से चर्चा हुई। लेकिन प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की तरफ से जारी बयान में इसका कोई जिक्र नहीं किया गया।

इसके द्वारा जो प्रेस विज्ञप्ति भ्ेजी जाती है वह सरकार की तरफ से भेजी गई मानी जाती है। मतलब साफ है कि सरकार देश की जनता से कुछ छुपाना चाहती है। बता दे कि इस प्रतिनिधि मंडल ने मोदी के समक्ष अनेक सम-सामयिक मुद्दों पर अपनी बात रखी लेकिन सरकार की ऐसी क्या मजबूरी बन गई कि मुलाकात में जिन मुद्दों पर बात हुई उनमें से कुछ को छुपाना पड़ गया। क्या मोदी सरकार इस बात को लेकर भयभीत है कि उसके राज में अल्पसंख्यक खुद को डरा सहमा और असुरक्षित महसूस कर रहा है या फिर वह आरएसएस से डऱी हुई है कि कहीं उस पर मुस्लिमों का हिमायती होने का दाग न लग जाए। आखिर क्यों लव जिहाद और गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमों को निशाना बनाये जाने की बात का सरकार की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कोई जिक्र नहीं किया गया। देश का अवाम यह जानने का हक रखता है कि ऐसी कौन सी मजबूरी आन पड़ी कि सरकार को अपनी जनता के सामने आधा सच और आधा झुट परोसना पड़ा। इस मुलाकात का पूरा सच अवाम के सामने आना चाहिए था लेकिन ऐसा नही हुआ, यह जनता के साथ धोका है या उसका दुर्भाग्य कहे। खैर। इस मुलाकात में मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने पीएम मोदी से और किन बातों पर चर्चा कि इसकी पड़ताल करते है। मेदी जी से हर इंसान ने एक सूर में कहा कि आप को एक तंत्र बनाने की आवश्यकता है ताकि देश के विकास में मुस्लिम वर्ग का योगदान और भागीदार सुनिश्चित की जा सकेगा। मोदी से मुलाकात के बाद प्रतिनिधि मंड़ल में शामिल बुद्धिजीवियों व धार्मिक नेताओं ने बताया कि हमारी चर्चा सकारत्मक रही। मुलाकात के बाद कई मुद्दों पर उम्मीद भी बनी है। हमने पीएम मोदी के समक्ष देश में गौ रक्षा और लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाये जाने की बात मजबूती से रखी। पीएम मोदी से लव जिहाद और गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमों को निशाना बनाये जाने पर साफ साफ बात की। इस समय गौरक्षा और लव जिहाद से मुस्लिमों के बीच भय का वातावरण पैदा हो रहा है। कई राज्यों में गौ रक्षा के नाम पर निजी संगठन कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। गौ हत्या का बहाना बनाकर हत्या की घटनाओं ने मुसलिम और दलित समाज में भय और आतंक की लहर पैदा कर दी है। इसे सख्ती से नहीं रोका गया तो इससे भय, निराशा और हताशा पैदा होगी। इसके नतीजे यकीनन नकारात्मक निकलेंगे। यह देश हित के खिलाफ हैं। इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में बूचडख़ानों पर की जा रही सख्ती जैसे कई मुद्दों पर भी बात की। यूपी में योगी सरकार बनने के बाद पैदा हुए माहौल का भी जिक्र किया। ये बात खास तौर से रखी कि चरमपंथी कानून को अपने हाथों में ले रहे हैं। किसी को इसकी इजाजत नहीं होना चाहिए। इस मौके पर प्रधानमंत्री से उस बात का भी जिक्र हुआ किउनके और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के उस बयान का असर भी जमीन पर नहीं दिख रहा है जिसमें दोनों ने कहा था कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी, चाहे वो जिस भी पृष्ठभूमि से आते हों। कानून लागू करने वाली एजेंसियों और प्रशासन स्तर पर भी बहुत कुछ किए जाने की बात हुई। आज कानून लागू करने वाली संस्थाएं भी अपना काम वाजिब ढंग से नहीं कर रही हैं। कोई भी व्यक्ति या संगठन कानून से ऊपर नहीं है। इस मुलाकात में जाहिर काजी, अध्यक्ष अंजुमन-ए-इस्लाम ने मोदी से कहा कि अब आप प्रधानमंत्री हो भारत के 125 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री। धर्म, जाति,संप्रदाय व समुदाय से ऊपर सभी के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध। इसके एवज में पीएम मोदी ने उनसे कहा कि ये मेरी जिम्मेदारी है कि कोई भी उत्पीडि़त महसूस न करे और इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने सभी मुद्दों पर सहानुभूतिपूर्ण तरीके से विचार करने का भरोसा दिया। इतना ही नहीं स्वयं प्रधानमंत्री ने तीन तलाक का राजनीतिकरण रोकने के लिए मुस्लिम नेताओं से आगे आकर पहल करने को भी कहा। बेशक ये सब बाते हुई और सही भी है लेकिन सरकार की तरफ से जारी विज्ञप्ति में उन बहुत सी खास बातों का कोई जिक्र नहीं किया गया जिन पर विशेष तौर से चर्चा हुई। काजी के अनुसार पीएम मोदी ने उनसे कहा कि , ये मेरी जिम्मेदारी है कि कोई भी उत्पीडि़त न महसूस करे इसका प्रेस रिलिज में कोई जिक्र नहीं था। पीआईबी की तरफ से जारी रिलिज में कहा गया कि प्रतिनिधि मंडल ने तीन तलाक के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के प्रयासों की सराहना की वह भी सही है लेकिन उस बात का जिक्र क्यों नही किया कि इस समय देश में जानबूझ कर मुस्लिमों को टारगेट बनाया जा रहा है जो हमारी मुलाकात का अहम हिस्सा रहा था। मुस्लिम गो हत्या, लव जिहाद के नाम पर मारा जा रहा है। इन बातों को प्रतिनिधि मंड़ल में शामिल हर इंसान ने अपने -अपने स्तर पर अलग-अलग तरीके से रखी लेकिन कुल मिलाकर लब्बो-लवाब यही था कि समुदाय को लग रहा है कि उसे निशाना बनाया जा रहा है। इस बात को कही जगह नही दी गई। आखिर इस बात को छुपाया क्यों गया। बहरहाल। क्या इतिहास में भी इस तरह के अवसर आए है जब हमारे नेताओं को कहीं न कहीं, किसी न किसी कारण आधा सच और आधा झूट बताने की तोहमत उठानी पड़ी हो या इस तरह से समझौता करना पड़ा हो जो पीआईबी को प्रेस रिलिज में करना पड़ा। इस बात को जानने के लिए चले थोड़ा पीछे इतिहास में चलते है। बेशक इतिहास में भी कुछ बाते बताने और कुछ छुपाने का खेल खेला जाता रहा है। या इसे यूं भी कह सकते है कि सच को झूट और झूट को सच साबित करने के प्रयास होते रहे है। सच पूछो तो धर्म के नाम पर हिंदुस्तान में मुस्लिमों के साथ होने वाली ज्यादतियां सदियों से होते चली आ रही है।
धार्मिकता की इसी कुंठित मानसिकता के चलते देश को तोडऩे के विफल प्रयास भी हो चुके है। बात सन 1928 की है उस समय हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन में सावरकर ने दो-राष्ट्रों का सिद्धांत रखते हुए कहा कि जिन प्रान्तों में मुस्लिम मेजोरिटी में हैं उन्हें मिलाकर मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान बना दिया जाए और बाकी हिन्दू मेजोरिटी वाले प्रान्तों से हिन्दू-राष्ट्र हिंदुस्तान बना दिया जाए। लेकिन बताने व छुपाने के इस खेल में जनता को यह नही बताया गया कि कौन एक राष्ट्र और कौन द्विराष्ट्र का पक्षधर है। इसको लेकर जनता को भ्रमित किया गया या सच से महरूम रखा गया कि हम अखंड़ हिंदुस्तान के पक्षधर है, भारत के नही। आज भी ये झूट बोला जाता है कि हम अखंड़ हिंदुस्तान के पक्षधर है, फिर तब क्यों दो-राष्ट्रों के सिद्धांत को हवा दी गई थी। क्या तब राष्ट्रवाद खंडि़त नही हुआ था। तब कहां गए थे भारत माता के सच्चे सेवक। आज जो लोग हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लोगों के बीच मारकाट का माहौल पैदा कर रहे है, एक दूसरे के बीच वैमनश्य फैला रहे है उन्हीं राष्ट्र भक्तोंं की हिन्दू महासभा ने जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सिंध और बंगाल में गठबंधन कर सरकार बनाई थी, तब कोई राष्ट्रवाद आड़े नही आ रहा था। तब किसी मुस्लिम से परहेज नही था क्योंकि तब सत्ता का मजा जो चखना था। इसमें दो राय नही है कि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है लेकिन क्या इसको आधार मान कर सावरकर के अनुसार कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा हो जाना चाहिए था? नही। दुख तो इस बात का है कि आज जो लोग राष्ट्रवाद की दुहाई देकर ये साबित करने का भ्रम फैला रहे है कि हम ही सच्चे देशभक्त ,सच्चे राष्ट्र सेवक है, तब कहा गए थे जब कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने की दुहाइयां दी जा रही थी। इतिहास तो इस बात का भी गवाह है कि आरएसएस और हिन्दू महासभा ने कश्मीर के राजा हरिसिंह के खिलाफ जम्मू भी बंद रखा था। यह बंद केवल इसलिए रखा गया था कि कश्मीर का भारत में विलय न हो। मतलब आज जो लोग एक अखंड़ हिंदुस्तान की बात कर रहे है वही कभी कश्मीर के भारत में विलय के विरोधी नही रहे। क्या आरएसएस और हिन्दू महासभा ने जम्मू-बंद करके कश्मीर के भारत में विलय का विरोध करने की बात हमसे आज तक नही छुपाई। इस मौके पर आपको यह बात भी जानने का पूरा हक बनता है कि जो लोग आज यह कहते है कि कश्मीर की आज जो दुर्दशा है उसके लिए जिम्मेदार देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडि़त जवाहरलाल नेहरू ही है। दरअसल सच ये है कि नेहरू-पटेल ने कश्मीर को मुस्लिम-बहुल होने के बावजूद पाकिस्तान के साथ नहीं जाने दिया और राजा हरिसिंह से समझौता कर कश्मीर को भारत से जोड़े रखा। ये भी जान ले कि राजा हरिसिंह से जो समझौता हुआ था उसकी तीन शर्ते थी। सबसे पहली कश्मीर की सीमा की हिफाजत भारतीय सेना करेगी, कश्मीर में भारतीय रुपया चलेगा और कश्मीर में भारतीय पासपोर्ट चलेगा- बाकी बातें कश्मीर के संविधान के अनुसार रहेंगी। इसी आधार पर 1965 तक , जब तक पाकिस्तान ने आक्रमण नहीं किया था कश्मीर में अपना प्रधानमंत्री होता था। ये तो रही वो बाते जिनको आपके लिए जानना जरूरी था। अब हम इस्लाम के प्रति फैलाए जाने वाले भ्रम व उसके बड़े-बड़े और महान प्रशंसकों की जानकारी को छुपाए रखने के राज को। बता दे कि स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से बेहद अभिभूत थे। लेकिन कुछ फिरकापरस्त लोगों ने देश की जनता को इस सच से भी महरूम रखने में विशेष भूमिका निभाई। विवेकानंदजी वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफराज हुसैन को भेजे पत्र में उनने साफ लिखा कि ”अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो विशाल मानव-समाज के लिए बिल्कुल अर्थहीन है। विवेकानन्द साहित्य जिल्द 5, पेज 415 में स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था। बहरहाल छुपाने और बताने के इस मौके पर आज इतना ही जानते है बाकि फिर कभी। लेकिन अब आपको इस बात का फैसला जरूर करना है कि देश को खंडि़त होने से बचाने व खुद को सच्चे राष्ट्रवादी बताने वाले कितने वफादार या कितने गद्दार है।

(संजय रोकड़े, इंदौर)

(लेखक मीडिय़ा रिलेशन पत्रिका का संपादन करने के साथ ही सम-सामयिक विषयों पर कलम चलाते है। ये उनके निजी विचार हैं, 24hindinews की सहमति आवश्यक नहीं है)

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