इस देश की स्वतंत्रता में सभी लोगों का खून शामिल है

Aug 14, 2017
इस देश की स्वतंत्रता में सभी लोगों का खून शामिल है
इस समय पूरा देश 71 वें स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मना रहा है। स्कूल, कॉलेज, मदरसों और विश्वविद्यालयों में छात्र और शिक्षक इस विशेष अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम कर रहे हैं। इसके अलावा हर वर्ग से जुड़े लोग स्वतंत्रता दिवस के आगमन की भावना से ही बहुत खुशी महसूस कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है कि इस देश के सभी नागरिक 15 / अगस्त 1947 को मिलने वाली स्वतंत्रता को अपने लिए एक महानतम उपहार समझते हैं कि जिस कारण उन्हें प्रतिबंधों से मुक्त एक खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला।
वर्तमान भारत की एक सच्चाई यह है कि एक तरफ बिना भेदभाव के सभी नागरिक इस विशेष अवसर पर संयुक्त रूप से स्वतंत्रता दिवस के तराने गाते हैं और उन स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अपना लहू देकर इस देश के लिए स्वतंत्रता का परवाना हासिल किया था, वहीं दूसरी ओर इस देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुशी के इस अवसर पर अपने दिल में दर्द की एक लहर भी महसूस करते हैं क्योंकि उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ सही मायने में अब तक पूरा नहीं हुआ है।
मामला ऐसा नहीं है कि भारत के स्वतंत्र होने के बाद जो संविधान बनाया गया और जिसे 26 / जनवरी 1950 को लागू किया गया इसमें मुसलमानों, दलितों और अन्य पिछड़े लोगों के अधिकारों की गारंटी नहीं दी गई है बल्कि इसमें तो अल्पसंख्यकों के धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक और अन्य अधिकारों को विभिन्न धाराओं और प्रावधानों के तहत स्पष्ट शब्दों में लिख दिया गया है और उन्हें सभी क्षेत्रों में पनपने और फलने फूलने की पूर्ण गारन्टी दी गई है। इसलिए इस संबंध में आप भारतीय संविधान के प्रावधानों 14,15,16,25,26,27,28,29,30,374 और 350 का अध्ययन कर सकते हैं जिसमें विभिन्न पहलुओं से अकलितयों के अधिकार सुरक्षित कर दिए गए हैं।
इस परिदृश्य के बाद इस देश के इंसाफपसंद लोगों के सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं– क्या इस देश को कुछ विशेष लोगों ने ही मुक्त कराया था क्या मुसलमान और दलितों ने इस देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया या फिर उनकी बलिदान दूसरों की तुलना में कम हैं? अगर ऐसा नहीं है तो आखिर इस देश में कुछ विशेष वर्गों के साथ अन्याय क्यों हो रहा है? इतिहास के पन्नों को पलटने से इन सारे प्रश्न के उत्तर बिल्कुल साफ हो जाते हैं और एक ग़ैर जानिबदार व्यक्ति बेझिझक इस बात को स्वीकार करने पर मजबूर हो जाता है कि इस देश की स्वतंत्रता में सभी लोगों का खून शामिल है।
इस देश की स्वतंत्रता के लिए हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी ने बलिदान दि, नवाब सिराजुद्दौला 1757 में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए पलासी के युद्ध में शहीद हुए, इस देश के लिए अपने खून की आखिरी बूंद तक बहा देने वाले राज्य मैसूर के शेर टीपू सुल्तान ने कई बार अंग्रेजों के दानट खट्टे किये और फिर 1799 में इस देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान को  भेंट कर दिया। आप से अंग्रेज इतना डरते थे कि आप की शहादत के बाद एक अंग्रेज जनरल चिल्ला उठा: ” आज भारत की अंतिम कड़ी भी टूट गई, अब दुनिया की कोई ताकत भारत को हमारी गुलामी से नहीं बचा सकती”
इसके बाद भारतीयों ने एक लंबा समय देखा और लगातार अंग्रेजों के जुल्म की चक्की में पसते रहे फिर 1857 में हिंदू और मुसलमानों ने मिल कर संघर्ष किया लेकिन दुर्भाग्य से अंग्रेजों ने भारतीयों पर सफलता प्राप्त कर ली। 1857 के युद्ध के बाद मौलवियों पर जो जुल्म ढाए गए इस की एक कहानी मौलाना जाफर थानीसरी अपनी पुस्तक “काला पानी” में यूं लिखते हैं:
“हमारे हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ियां, शरीर पर जेल के कपड़े और कमरपर लौह की सलाखें थीं। इस पिंजरे में लोहे की चोंच दार सलाखें भी लगवाई गई, जिसकी वजह से हम न सहाराले सकते थे, न बैठ सकते थे। हमारी आँखों से आँसू और पैरों से खून बह रहे थे।
बहरहाल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 तक एक सौ साल का सफर है जो हम ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए किया। इस दौरान लाखों कुर्बानियां दी गईं, जान व माल के भेंट पेश किए गए और बहादुरी की कई दास्तानें लिखी गई।
इसलिए स्वाभाविक बात यह है कि जब सभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शरीक थे तो स्वतंत्र भारत में हर दृष्टि से सभी के अधिकार भी बराबर होने चाहिए और संवैधानिक आधार पर है भी, लेकिन परेशानी की बात यह है कि मुट्ठी भर देश के दुश्मन अल्पसंख्यकों के अधिकार को हड़प करने पर तुले हुए हैं और इसी आधार पर भारतीय संविधान से खिलवाड़ करने वाले ये लोग मुसलमानों और दलितों पर अत्याचार करते हैं। जाहिर है कि ये इस देश की स्वतंत्रता की नींव को खोखला करने वाले आंदोलन हैं। क्यों कि अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार से इस देश को इसलिए स्वतंत्र नहीं किया गया था कि इस देश के लोग आपस में लड़ें, निर्बलों पर अत्याचार करें, बेगुनाहों का खून बहाएं, महिलाओं के साथ बलात्कार हो, जानवरों के नाम पर इंसानों का गला घोंटा जाए और राजनीति के नाम पर सौदेबाजी हो।
हम स्पष्ट शब्दों में यह सकतेकह हैं की जो लोग अल्पसंख्यकों के दुश्मन हैं वह वास्तव में इस देश के दुश्मन हैं क्योंकि अगर किसी देश में एक वर्ग विकास में पीछे रह जाए तो वह देश कभी भी विकसित देश नहीं बन सकता और जिस देश में कमज़ोरों पर ज़ुल्म हो वह देश कभी भी शांति का गहवारा नहीं बन सकता। इसलिए अगर भारत को विकसित देश बनाने के सपने को साकार करना है तो इस देश के बागडोर संभालने वाले लोगों को सबको साथ लेकर चलने के नारे को वास्तविकता में पूरा करना होगा। इसी के साथ वर्तमान परिस्थितियों के बावजूद इस देश में किसी को भी बिल्कुल निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान में उनके सभी अधिकार सुरक्षित हैं बस उन्हें पाने के लिए लगातार संघर्ष की जरूरत है।
मुद्दस्सिर अहमद क़ासमी
(लेखक मरकज़ुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर मुम्बई मैं लेक्चरर और ‘ईस्टर्न क्रिसेंट’ मैगज़ीन के असिस्टेंट एडिटर हैं। )
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