शरीफ़ों के कपड़े उतरते हैं, लेकिन बदनामी मेरे मत्थे ही चढ़ती है, क्योंकि मैं धंधे वाली लड़की हूं, मेरी हर चीख..

May 19, 2017
शरीफ़ों के कपड़े उतरते हैं, लेकिन बदनामी मेरे मत्थे ही चढ़ती है, क्योंकि मैं धंधे वाली लड़की हूं, मेरी हर चीख..

मैं समाज में रहते हुए भी समाज से कटी हुई हूं, लोग मेरे पास एक ख़ास मक़सद के लिए आते हैं। मक़सद पूरा होते ही वो मेरे पास से ऐसे भागते हैं जैसे किसी ने उन्हें मेरे साथ देख लिया, तो क़यामत आ जायेगी। मैं जो काम करती हूं, वो दुनिया की नज़रों में ग़लत है पर मैं जानती हूं मैं सही हूं। भूखे मरने से सौ दफ़ा बेहतर है काम करना। मैं भी काम करती हूं, मेरा काम जिस्म बेचना है।

आपकी नज़रों में मैं वेश्या, रंडी, पतुरिया या धंधे वाली लड़की हूं. कुछ पैसों के लिए अपना जिस्म बेचने को तैयार हो जाती हूं. कई बार मेरे ग्राहक मुझे पैसे भी नहीं देते हैं. उधारी में जिस्म भी बिकता है. आम तौर पर मेरे साथ उधारी का रिश्ता रखने वाले शहर के बड़े और दबंग टाइप लोग होते हैं या सरकारी अफ़सर.
चौंकते क्यों हैं अफ़सरों को मेरी ख़ास ज़रुरत पड़ती है. मेरे पास आने पर उन्हें एक साथ कई फ़ायदे हो जाते हैं. पहला फ़ायदा होता है कि उन्हें मुफ़्त में मेरा जिस्म मिल जाता है और दूसरा फ़ायदा होता है कि मुझसे वे पैसे भी एंठ लेते हैं।

मेरा रिश्ता पुलिस वालों से भी अच्छा बन जाता है. हफ़्ते में तीन-चार बार तो पुलिस स्टेशन मुझे चेहरा ढक के जाना ही पड़ता है। कई बार शहर के छटे हुए बदमाशों को तलाशने पुलिस वाले मेरे कमरे में भी घुस आते हैं. अगर बदमाश न मिला, तो मैं तो मिल ही जाती हूं उन्हें. मेरे पास आकर उनका नुकसान कभी नहीं होता है. इस धंधें में मैं रोज़ मरती हूं, लेकिन मेरे मरने से मेरे ग्राहकों को मज़ा आता है।

औरत अगर बाज़ार में ख़ुद को बेचने पर उतर आये, तो बच्चे-बूढ़े और जवान सब ख़रीददार बन जाते हैं. ये पूछिए कौन नहीं आता मेरे पास? बच्चे, जवान, अधेड़, बूढ़े सबको मेरी ज़रुरत होती है. शहर में शराफ़त के सारे ठेकेदार मेरे कमरे में गड़ी खूंटी पर अपने सफ़ेद कपड़े उतारते हैं। जज, वकील, डाक्टर, मास्टर, इंजीनियर, मंदिर वाले महंत और मस्जिद वाले मौलवी भी मेरे कोठे पर आ जाते हैं. अकसर मैं भी उनके पास चली जाती हूं. क्या है न वहां मुझे नोचने के लिए बहुत सारे भेड़िये पलकें बिछा कर बैठे होते हैं. उनकी हैवानियत पर मुझे सिसकियां भरने के पैसे मिलते हैं। अगर बाज़ार में मैं उन्हें न मिलूं, तो न जाने कितनी निर्भया सड़कों पर खून से तर-बतर दिखाई दें. मर्द अपने शरीर की भूख किसी को भी शिकार बना कर मिटा सकता है, चाहे वो पांच साल की बच्ची हो या अस्सी साल की बुढ़िया. उन्हें मतलब बस औरत के जिस्म से होता है।

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मेरे पास आने वाले अलग-अलग प्रोफ़ेशन के लोग सिर्फ़ जिस्म से खेलने के लिए आते हैं और मेरा जिस्म उनके लिए एक खिलौने से ज़्यादा कुछ नहीं होता, जिसे नोचकर कर ही इन्हें चरम सुख मिलता है. इसीलिए वो मुझे पैसा देते हैं. ऐसे में ख़ुद को उत्पाद की तरह बेचने पर भी मैं प्रोफ़ेशनल क्यों नहीं? उन्हें अपने काम के बदले में समाज से सम्मान मिलता है, तो मुझे मेरे काम की वजह से नफ़रत क्यों?
ये कैसा दोगलापन है?

अजीब सा लगता है जब मुझे घर से बाहर निकलने पर समाज के ठेकेदारों से गालियां मिलती हैं. इन्हें लगता है कि मेरे समाज के मुख्य धारा में आने से इनकी बहन-बेटियां और आने वाली पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी. फिर न जाने क्यों ये लोग शाम ढलते ही मेरे कोठे की ओर आने लगते हैं. इंतज़ार करते हैं कब मैं इन्हें अपने कमरे में बुला कर प्यार करूं. तब मैं इन्हें जन्नत की हूर, परी और अप्सरा क्यों लगने लगती हूं?समाज में इतना दोगलापन क्यों है ?

अगर मैं लिख भी दूं तो आप पढ़ नहीं पायेंगे, लेकिन ज़रूर पढ़ेंगे आप. सेक्स लिखा जाए और लोग पढ़ें न ये कैसे हो सकता है? हां! भाई, मोबाइल की हिस्ट्री साफ़ करने में कितना वक़्त लगता है ? हो सकता है आप में से कुछ लोगों को किसी पॉर्न मूवी का कोई सीन याद आ जाए. कुछ को इसमें चरम सुख मिल सकता है. कुछ लोग रस लेकर इसे दोस्तों को इनबॉक्स भी कर सकते हैं. सेक्स जो शामिल है इसमें।

जानते हैं? मुझे उनकी हर डिमांड पूरी करनी होती है. वो मुझे नहीं मेरा वक़्त खरीदते हैं और उस वक़्त में मैं उनके लिए केवल खिलौना होती हूं. वो मुझसे जैसा चाहते हैं वैसा करवाते हैं। मैं वो सब करते वक़्त बेमौत मरती हूं. मेरी चीख पर ग्राहक खुश होता है. उसे लगता है कि उसमें मर्दानगी अभी बची हुई है.
बदचलन वो हैं, मगर बदनाम मैं हूं।

जैसे ही शाम ढलती है मुझसे मिलने वालों का तांता लग जाता है. फ़ोन भी आने लगते हैं. कोई मुझे फ़ार्म हाउस पर बुलाता है, तो कोई खंडहर के पीछे. कुछ कार में भी बुला लेते हैं. बीवी-बच्चे वाले अकसर मुझे होटल में बुलाते हैं, वहां उन्हें बदनाम होने का डर कम होता है। मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ-जा सकती हूं क्योंकि बलात्कार का डर नहीं है. न ही घर वाले मुझे सर्विलांस पर रखते हैं. मेरा बलात्कार तो मेरी सहमति से होता है. शायद इसलिए ही मैं बदनाम हूं. यूं तो मेरे पास शहर के सारे शरीफ़ों के कपड़े उतरते हैं, लेकिन बदनामी केवल मेरे मत्थे ही चढ़ती है, क्योंकि मैं धंधे वाली लड़की हूं, सब कहते हैं मैं चरित्रहीन हूं।

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बाज़ार में दुकानें कुछ बेचने के लिए ही लगाई जाती हैं. मेरा भी बाज़ार लगता है। कुछ दल्ले मुझे भी बेचते हैं, कुछ अच्छे दल्ले भी होते हैं. कमीशन कम खाते हैं और ग्राहकों से मोटी रकम दिलाते हैं, कमीशन खाना उनका धंधा है और जिस्म बेचना मेरा। मैं जिस्म बेचती हूं, तो गलत क्या करती हूं? अगर लोगों का मेरा जिस्म कुछ वक़्त के लिए खरीदना ग़लत नहीं है, तो मेरा जिस्म बेचना क्यों गलत है? समाज को जो भी लगे मगर मैं गुनाहगार नहीं हूं, मेरी वज़ह से तुम इज़्ज़तदार बचे हुए हो।

मेरी तो कोई इज़्ज़त नहीं होती किसी की नज़रों में, धंधेवाली जो हूं, मेरे पास जो ग्राहक आते हैं, वो मुझे जिस तरह से रौंदते हैं वैसा अगर किसी और लड़की के साथ कर दें तो शायद ज़िन्दा बचना मुश्किल हो. हर तरह की कुंठा मुझ पर उतारते हैं मर्द। जब हम धंधे वाली लड़कियां हर शहर में किसी न किसी बस्ती में, थोड़े पैसे फेंकने पर आसानी से मिल जाती हैं, तब समाज में इतने बलात्कार होते हैं सोचिए अगर मैं न होती, तो इस इज़्ज़तदार समाज का क्या होता? कितनी ही लड़कियों को मर्द अपनी हवस के हवाले कर देते और कितनी लड़कियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता। बहन, बेटी, भाभी, पत्नी सब इज़्ज़त हैं परिवार की. किसी लड़के साथ किसी लड़की को प्यार हो जाए तो घर वालों की इज़्ज़त डूबने लगती है. ऐसे में उनका बलात्कार कैसे घर वाले बर्दाश्त करते. झूठ-मूठ की ओढ़ी हुई इज़्ज़त तो लुट जाती न? अब मानते क्यों नहीं कि मेरी वज़ह से समाज की बहन-बेटियां दरिंदों से बची हुई हैं।

मेरा एहसान कोई क्यों माने जब मुझे तीसरी दुनिया का समझा जाता है. मैं तो धंधे वाली हूं न? मेरा समाज को बनाने में क्या योगदान है? रात होने से पहले हर शरीफ़ मुझसे मिलने से कतराता है. मैं तो मर्दों के साथ कुछ पल सोने के लिए ही तो बनी हूं. फ़्री में थोड़े ही सोती हूं. पैसे मिलते हैं मुझे सोने के लिए.
दुनिया मेरा एहसान माने या न माने लेकिन मैं जानती हूं मेरी हर चीख पर बलात्कार थमते हैं, नहीं तो शराफ़त से भरी इस दुनिया में, हर पल चीखती-चिल्लाती लड़कियों की आवाजें सुनाई देतीं, जिनके साथ रेप हो रहा होता। अगर फ़ौजी सरहद पर देश की इज़्ज़त बचा रहे हैं, तो मैं भी देश में रहने वाले लोगों की इज़्ज़त बचा रही हूं, जो लड़कियों के साथ होने वाली हर अनहोनी घटना पर लुट जाती है।

कैसा लगता है आपको इस धंधे में रहना? आप मेन स्ट्रीम सोसाइटी में कब आएंगी? क्या आपको नहीं लागता आप ग़लत कर रही हैं? आप शादी क्यों नहीं कर लेतीं? एक दिन में कितना कमा लेती हैं? क्या आपके साथ कभी ज़ोर-ज़बरदस्ती हुई है? ये सब करते हुए कितने दिन हो गए आपको? आप छोड़ क्यों नहीं देतीं ये धंधा? आपको ज़बरन लाया गया है या इस धंधे में आप अपनी मर्ज़ी से हैं? आपको अपने बच्चों के बाप के नाम याद हैं?
एक दिन में कितनी बार सेक्स करना पड़ता है आपको? क्या आप पीरियड्स में भी सेक्स करती हैं?

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मुझ पर लिखने से आपका धंधा चल जाएगा न? आप लिखने के धंधे में हैं न? आप इसे छोड़ क्यों नहीं देते? मैं अपना धंधा क्यों छोड़ दूं?
मैं इन सवालों के ज़वाब क्यों दूं? सहानुभूति है न आपको मुझसे? क्या भूल कर भी आपने कभी मेरी समस्याओं पर लिखा है? कभी मुझे समझने की कोशिश की है? मैं कभी आपके प्राइम टाइम डिबेट का हिस्सा रही हूं? कभी आपने मुझे अपने एडिटोरियल पेज पर जगह दी है? कभी मेरा इंटरव्यू छापा है?
कभी-कभी कुछ लोग आते हैं मुझ पर लिखने, पर मैं उन्हें एक धंधे वाली से ज़्यादा कुछ लगती ही नहीं. उनकी पूरी कहानी मेरे शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमती है।

कहने को तो मैं भी, इसी समाज में रहती हूं लेकिन समाज मुझे अपना हिस्सा नहीं मानता। समाज शायद उस दिन मुझे समझ जाए जिस दिन, मुझे अपना हिस्सा मान ले. मेरी कालोनियां बदनाम हैं. मैं चाहे नागपुर, सोनागाछी, बलिया, वैशाली, दिल्ली, मेरठ या बस्ती में रहूं, मैं रहूंगी रंडी ही। लोग दिन में मुझसे मिलने से कतराते हैं और शाम होने पर मैं, उन्हें उनकी बीवी या महबूबा से ज़्यादा प्यारी लगती हूं. यही मेरी नियति है। दिन के उजाले में मैं अभागिन रहती हूं और रात में मैं कई बार सुहागिन बनती हूं।

हर समाज के लोग मेरे पास आते हैं, लेकिन अफ़सोस मैं इस समाज का हिस्सा नहीं हूं. मैं समाज में रहते हुए भी समाज से कटी हुई हूं. मुझे समाज न उगल पाता है न निगल पाता है. मैं समाज के लिए एक सेक्स ऑब्जेक्ट से ज़्यादा नहीं हूं जिसके पास लोग बस अपनी हवस मिटाने आते हैं। अगर समाज मेरे साथ इतना गंदा व्यवहार करके भी साफ़-सुथरा है, तो मैं भी पवित्र हूं. उतना ही जितना यह समाज। मैं जिस्म बेचती हूं और यही मेरा प्रोफ़ेशन है और मुझे इस पर कोई मलाल नहीं है. मुझे भी समाज से उतनी ही इज्ज़त चाहिए जितनी सबको मिलती है. मैं बिलकुल भी अलग नहीं हूं. हां! मैं जिस्म बेचती हूं और यही मेरा प्रोफ़ेशन है।
(ये लेख मेरठ के रेड लाइट एरिया में रहने वाली, एक वेश्या से हुई मेरी बात-चीत पर आधारित है)

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