आतंकवाद के झूठे आरोप में 11 साल गुजारे जेल में इरशाद अली ने, बाहर आने पर अपना सब कुछ खोया

Dec 27, 2016
आतंकवाद के झूठे आरोप में 11 साल गुजारे जेल में इरशाद अली ने, बाहर आने पर अपना सब कुछ खोया

मोहम्मद युनुस जो कि इरशाद अली के पिता 50 साल पहले पैगंबरपुर गांव से दरभंगा नौकरी की तलाश में आए थे, उनके कुल आठ बच्चे थे, दो बेटे और छह बेटियां. उन्हे एक दुकान में नौकरी मिली और इरशाद दरभंगा के मदरसा में पढ़ाई के लिए जाने लगा. लेकिन, अली को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ गई क्योंकि एक मर्डर के केस में बड़े भाई को गिरफ्तारी कर लिया गया था।

इरशाद अली कुछ काम कि तलाश में 1991 में दिल्ली आ गया। इसके बाद अली के भाई को आतंकवाद के केस में गिरफ्तार किया गया। 1996 में बड़े भाई और उसके पिता को पुलिस ने पकड़ लिया। इरशाद ने बताया कि एसीपी राजबीर सिंह ने 10 दिन तक हमें मॉरिस नगर में रखा। मेरे पिता के ऊपर मेरे सामने ही जुल्म ढाये गए। पुलिस वाले कहते रहे कि मेरा भाई एक आतंकवादी है और साथ में मुझे भी, उनकी मां ने जब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तब पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया। इसके बाद क्राइम ब्रांच ने उन्हें फिर पकड़ लिया और 8 दिनों तक रिमाण्ड पर रखा। इन्फॉर्मर बनने का दबाव डाल रहे थे। 2001 में मुझे एक आईबी के अफसर मजीद अली ने पकड़ लिया, जिसका दूसरा नाम खालिद था। उन्होंने मेरे दर्जी दोस्त रिजवान को भी पकड़ लिया। उन्होंने कहा कि मैं अपने भाई को खत लिखूं और कहूं कि मुझे बचाने के लिए वह वही करे जो कहा जा रहा है। नौशाद पुलिस की तरफ से जेल के अंदर काम करने के लिए तैयार हो गया और इरशाद अली बाहर से, हमें 5000 रुपये सैलरी और एक फोन दिया गया। मेरे भाई का काम उन लोगों पर नजर रखना था। जो आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार हुए हैं और मेरा काम मजीद को रिपोर्ट करना था। आरोपी जो खत पोस्ट करने को देते थे वह मुझे मजीद को देने होते थे।

इरशाद अली ने बताया कि योजना थी कि हम बॉर्डर पार कर एक विद्रोही संगठन में घुसपैठ करेंगे। जिसके लिए मुझे 2004 में कश्मीर के फयाज से मिलवाया गया। लेकिन यह प्लान कामयाब नहीं हुआ। इसके बाद 2005 में मजीद ने मुझे धौला कुआं ऑफिस बुलाया। मुझे कार में बंद कर आंखों पर पट्टी बांध दी गई। लंबे समय तक वह सुरक्षा एजेंसी के लिए काम करता रहा लेकिन जब उसे एक मामले में बतौर आतंकी के रूप में गिरफ्तार कर सामने रखा गया तो मेरी उम्मीदें खत्म हो गई। हालांकि इस मामले में सीबीआई जांच बैठाई गई और इरशाद को बरी कर दिया गया और उसपर लगाए गए आरोपों को गलत बताया गया। इरशाद अली कहते हैं कि उन्हें रिहा तो कर दिया गया लेकिन मेरा परिवार कई दिनों तक भूखा रहा, मेरे बच्चों को खाने के लाले पड़े थे, हम गरीब हैं और हमारे साथ ऐसा ही होता है। जो बड़े ही दुख की बात है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार इरशाद को अफसोस है कि जेल जाने के एक साल के भीतर उनकी मां की मौत हो गई। मौत से पहले तक वह लगातार पुलिस के दरवाजे खटखटाती रही, सभी जगह कहती रही कि बेटा बेकसूर है, बेगुनाह है, लेकिन पुलिस से उन्हें बार-बार सिर्फ बेइज्जत ही किया। बेटे की जेल से रिहाई की उम्मीद में इसी साल इरशाद के पिता का भी इंतकाल हो गया। इरशाद अली कहते हैं कि मुझे जेल से रिहा कराने के लिए पिता ने अपनी सारी कमाई खर्च कर दी। अपने बच्चों के प्यार से मरहूम रहने का अफसोस जाहिर करते हुए इरशाद अली ने बताया कि मेरी बेटी आयफा सिर्फ 6 महीने की थी जब मुझे जेल हुई थी। अब वह बड़ी हो गई है। उसे मेरा और मुझे उसका प्यार नसीब नहीं हुआ।

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