कभी SP से लेकर इंस्पेक्टर तक शहाबुद्दीन के रहमोकरम पर पहनते थे वर्दी,पहली बार मोदी की CBI करेगी हत्या की जाँच

May 17, 2016

नई दिल्ली : डिप्टी एसपी संजीव कुमार का कॉलर पकड़ कर लात घूसों से मारने वाले शहाबुद्दीन ने अपने 21 साल के राजनीतिक करियर में सिवान के कई एसपियों का थप्पड़ और लात जूतों से स्वागत किया है. उनके इसी आतंक से तंग आकर 2001 में सिवान की पुलिस फ़ोर्स ने उनके घर को चारों तरफ से घेर लिया था. लेकिन बिहार में सरकार लालू की थी और वह अपने सबसे चहेते सांसद यानि बाहुबली शहाबुद्दीन को बचने में कामयाब हो गए. बिहार के सबसे बड़े डॉन शहाबुद्दीन आज भले ही 7 सालों से जेल में हों . लेकिन उसकी इजाजत के बगैर पूरे जिले में एक गज जमीन भी खरीदने की किसी की हैसियत नहीं है.

पहली बार मोदी की CBI करेगी पत्रकार हत्या की जाँच
लेकिन पहली बार सिवान में हुई पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या की जाँच मोदी की सीबीआई करेगी. बिहार के मुख्य्मंत्री नितीश कुमार ने इस मामले में सोमवार को ही राज्य के डीजीपी को पत्रकार के परिवार की मांग पर रंजन हत्याकांड की जाँच सीबीआई से कराए जाने के आदेश दिए है. गौरतलब है कि बिहार में आतंक का खौफनाक चेहरा बना यह वही शहाबुद्दीन है जिसने अपनी पत्नी हिना को चुनाव हरा देने वाले जनता दल यूनाइटेड के नेता ओम प्रकाश यादव के 9 खास चहेतों को अलग-अलग स्थानों पर मौत के घाट उतार कर हार का बदला लिया था. जदयू के 9 पार्टी वर्करों की इस सनसनीखेज हत्या ने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया था. यह बात उस समय की है जब अदालत से अपराधिक मामलों में सजा सुना दिए जाने के शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी.

4 बार MP और 2 बार MLA रहा है शहाबुद्दीन
सिवान से चार बार MP और दो बार MLA रहे शहाबुद्दीन के जेल में बंद होने पर साल 2004 में उनकी पत्नी हिना चुनाव लड़ी और 1 लाख वोटों से चुनाव हार गई. जिसके चलते जब सिवान के डॉन की खिल्ली उडी तब उसने रातोंरात जदयू के नेता के खासमखास पार्टी वर्करों की जेल से बैठे- बैठे हत्या करा दी.बताया जाता है कि साल 1990 से लेकर 1995 तक बिहार विधानसभा में इस शातिर अपराधी के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस कोई नहीं जुटा सका. साल 2007 में हत्या और अपहरण के मामले में सजा होने पर शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर अदालत ने रोक लगा दी.

अपराध का मास्टर माइंड है शहाबुद्दीन
राजनीतिशास्त्र में डॉक्टर की उपाधि लेने वाला शहाबुद्दीन अपराध का मास्टर माइंड है. अपराधजगत में पहली बार 1980 में शहाबुद्दीन का नाम उस समय चर्चा में आया जब CPIML के कॉडर से वह सीधे टकरा गया. इसके बाद बीजेपी की रथ यात्रा से मोर्चा लिया. साल 1986 में शहाबुद्दीन के खिलाफ पढ़ाई के दौरान उसके खिलाफ पहला मुकदमा दर्ज हुआ. बताया जाता है कि सिवान के हुसैनगंज थाने का शहाबुद्दीन ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर अपराधी है. बिहार से जुड़े अपराधियों कि मानें तो जब मुकदमें बढ़े तो उनसे बचने के लिए शहाबुद्दीन ने लालू से पनाह मांगी. लालू ने अपने युवा दल में उसे शामिल ही नहीं किया बल्कि उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी दे दिया. जिसके चलते वह पहली बार 1995 में ही चुनाव जीत गया.

लालू के राज में राजा बना था शहाबुद्दीन
विधानसभा का चुनाव लड़ने के बाद अगला चुनाव सांसद का शहाबुद्दीन ने लड़ा और उसे भी पहली बार में ही जीत लिया.इसके बाद तो शहाबुद्दीन बिहार का डॉन बन गया. लालू के बढ़ते वर्चस्व के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में शहाबुद्दीन का आतंक बढ़ गया. पुलिस डरने लगी. हत्याएं होती गई और शहाबुद्दीन के खिलाफ दर्ज केस समाप्त होते गए. आलम यह था कि SP से लेकर इंस्पेक्टर तक शहाबुद्दीन के रहमोकरम पर वर्दी पहनते थे. बताया जाता है कि शहाबुद्दीन इतना ज्यादा घमंड में चूर हो गया कि वह खुलेआम रोड पर पुलिस वालों की पिटाई करने लगा. इतना ही नहीं एक बार तो उसने पुलिस पर फायरिंग तक पुलिस पर कर दी. बताया जाता है कि वर्ष 16 मार्च 2001 में पुलिस RJD के जिला अध्यक्ष व शहाबुद्दीन के चेले मनोज कुमार पप्पू को मय वारंट के जब गिरफ्तार करने पहुंची तो वहां आये डीएसपी संजीव कुमार को शहाबुद्दीन ने थप्पड़ जड़ दिया और उसे गिरफ्तार नहीं करने दिया.

क्यों बागी हुई पुलिस ?

इसके बाद पुलिस ने शहाबुद्दीन पर ही केस दर्ज कर दिया. इसके बाद बिहार की पुलिस बागी हो गई और फिर पुलिसवालों ने शहाबुद्दीन की बगावत शुरू कर दी और शहाबुद्दीन के ठिकाने पर छापा मर दिया. मामला यूपी के बॉर्डर से लगा होने के कारण PAC की कंपनी भी मौके पर जा पहुंची. इस दौरान दोनों और से फायरिंग हुई, जिसमें दो पुलिसवाले मारे गए और शहाबुद्दीन के 8 लोग इस मुठभेड़ में मारे गए. इस दौरान मौके से एसपी पहले ही भाग निकले. पुलिस से जान बचाकर शहाबुद्दीन भाग निकला. पुलिस ने उसके घर से 2 एसएलआर और भरी मात्र में कारतूस बरामद किये. मगर लालू की सत्ता होने के कारण शहाबुद्दीन और उसके चेले मनोज की गिरफ़्तारी नहीं की जा सकी. और तो और लालू की सरकार में शहाबुद्दीन इतना अधिक शक्तिशाली हो गया कि उसके घर पर ही जनता की अदालत का फैसला किया जाने लगा. इस अदालत में जमीन पर कब्जे समेत अन्य मामले निपटाए जाने लगे.

पत्नी के चुनाव में हारने के बाद की थी 9 हत्याएं
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में साल 2004 में होने वाले आम चुनाव से पहले जब शहाबुद्दीन ने सीपीआई के एक वर्कर का अपहरण किया था, जिसका पता आज तक नहीं चला है. पकडे जाने पर शहाबुद्दीन अस्पताल में भर्ती हो गया. इतना ही नहीं अस्पताल में उसके लिए एक फ्लोर खाली करा दी गई और यहीं से उसने अपना चुनाव लड़ा, और तो और साहब का आतंक यह था उनके गुर्गो के आदेश पर सिवान के एक-एक दुकानदार ने अपनी दुकान में उसकी फोटो तक लगा डाली और चुनाव भी जीता. रिपोर्ट के मुताबिक उधर 14 साल बाद जदयू के प्रत्याशी ओम प्रकाश यादव ने जब बिहार के डॉन की पत्नी को चुनाव हराकर 2 लाख वोटों से चुनाव जीता तो लोगों में एक उम्मीद की किरण जागी. यही नहीं अख़बार की सुर्खियां भी यादव बने.

बिहार के इस डॉन के खिलाफ दर्ज है 34 केस
लेकिन अपनी खिल्ली उड़ते देख शहाबुद्दीन अपनी पत्नी की हार बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने अपने गुर्गों के जरिये जदयू नेता को समर्थन कर रही जनता की पिटाई शुरू कर दी. इतना ही नहीं भाटापोखर गांव में रहने वाले पंचायत मुखिया हरिंदर कुशवाहा को सरकारी कार्यालय में ही गोलियों से छलनी कर हत्या कर डाली. इसके बाद जदयू नेता ओम प्रकाश यादव के घर पर ताबड़तोड़ सैकड़ों राउंड फायरिंग कर पूरे घर पर गोलियों के ही निशान बना डाले. सिवान के इस डॉन पर 34 मुकदमें चल रहे है. इन मुकदमों में 302 और 307 के सबसे अधिक मामले दर्ज है.

शहाबुद्दीन के ISI से भी जुड़े थे तार
जानकारों के मुताबिक साल 2005 में सिवान के एसपी रतन संजय ने जब शहाबुद्दीन के परतापुर घर पर छापा मारा तो उसके घर से AK -56 लेजर गाइडेड गन और नाईट विजन कई हथियार बरामद हुए. इन हथियारों पर पाकिस्तान की मुहर लगी थी. जिसके चलते बिहार के DGP डीपी ओझा ने केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट में इस बात से अवगत कराया की शहाबुद्दीन के संबंध ISI से है. इस मामले में शहाबुद्दीन के खिलाफ अलग-अलग मामलों में 8 मुकदमें बिहार पुलिस ने दर्ज करें. इत्तेफाक से शहाबुद्दीन का केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने लालू यादव की वजह से सपोर्ट किया और शहाबुद्दीन आकर दिल्ली के MP आवास में आकर छिप गया. बताया जाता है कि तीन महीने तक दिल्ली पुलिस के पास शहाबुद्दीन की गिरफ़्तारी का वारंट होने के बाद भी वह हाथ पर हाथ धरके बैठी रही. इसके बाद बिहार पुलिस ने तीन महीने बाद बिना दिल्ली पुलिस की मदद लिए शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया.

शहाबुद्दीन को क्यों हुई उम्र कैद ?
सूत्रों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन की बेल अर्जी यह कहते हुए ख़ारिज कर दी की क्या MP होने के चलते शहाबुद्दीन अर्धस्वचालित हथियार रख सकते है. यह हथियार तो CRPF के पास भी नहीं है. साल 2006 में जब बिहार में बीजेपी की सरकार बनी और नितीश कुमार सीएम बने तब उन्होंने ऐसे अपराधियों के लिए एक स्पेशल कोर्ट बना दी. बिहार के बढ़े माफिया सूरजभान , प्रभुनाथ समेत शहाबुद्दीन पर 8 हत्या और 20 मुकदमें 307 के चल रहे थे. बताया जाता है कि साल 2006 में जिस अदालत में यह केस चल रहा था उसके जज बीबी गुप्ता को ही शहाबुद्दीन ने जान से मारने की धमकी दे डाली. बाद में हाईकोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा. मई 2007 में CPIML के वर्कर छोटेलाल के अपहरण में शहाबुद्दीन को उम्र कैद की सजा सुनाई गई. तब से शहाबुद्दीन जेल में बंद है.

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