भाषण देने की मुसीबत से ऐसे पिंड छुडाएं…

Feb 01, 2016
भाषण देना यूं तो एक कला है, लेकिन फंसने की जोखिम वहां भी कम नहीं होती है। कई बार कला एक बला भी बन जाती है। किसी शायर ने कहा है, जिव्हा तू बड़ी बावरी कहे अकाश पताल, तू तो कह भीतर गई, जूते पड़े कपाल। लेकिन इस आग के दिरया में डूबकर बाहर निकलने के गुर भी हैं।
आप अध्यक्ष हों या मुख्य अतिथि नंबर बहुत बाद में आता है। यह बहुत सुविधाजनक स्थिति है। आप कह सकते हैं इतना कुछ पहले ही कहा जा चुका है कि अब बोलने को कुछ रह ही नहीं जाता? फिर आप लोग भी समझदार हैं? इतना कहकर आप उस मुसीबत से छुटकारा पा सकते हैं। वैसे भी अपना समाज भाषण वीरों से भरा पड़ा है। इतनी देर तक लोग पहले ही बोल चुके होते हैं कि श्रोताओं को नाश्ते या भोजन की प्लेट दिखाई पड़ती है, वक्ता की सूरत नहीं। चमचों की खनखनाहट सुनाई पड़ती है, वक्ता की आवाज नहीं। कई बार समझदार संचालनकर्ता खुद ही कह देते हैं अब अध्यक्ष महोदय दो शब्द बोलेंगे। आप दो की जगह चार शब्द “आप सभी को धन्यवाद’ बोलकर बैठ सकते हैं।
कभी कभी सब गोलाई में बैठे हुए डिनर के लिए आए हुए हैं और आपसे भाषण देने का आग्रह किया जाता है। आपकी आवाज सभी तक नहीं पहुंचती, सामने माइक भी नहीं है। श्रोता भी चाहते हैं कि मिठाई उनके मुंह में पहुंचे, कानों में भाषण नहीं। तब आप भी नमकीन या एक दो मीठे वाक्य ठोंककर बैठ जाएं या एकाध प्रश्न पूछकर श्रोताओं को ही परस्पर उलझा दीजिए। सामने वालों को बांटो और वहां से हट जाओ।
कई बार आपको अध्यक्ष की पत्नी के बगल में बैठा दिया गया है। अध्यक्ष की पत्नी बहुधा आकर्षक और सजी धजी होती हैं। आपके लिए इससे भी अधिक मनभावन बात यह होती है कि वह सुमुखी मुख्य अतिथि से याने आपसे बहुत घनिष्टता दिखाती है। आप इस डूबने उतराने में भाषण का सारा, सार संक्षेप, भूल जाते हैं भाषण की शुरुआत में ही स्वीकार कर लीजिये कि” मेरे पास एक मनमोहिनी को बैठाकर मुझे आयोजकों ने कहीं का नहीं छोड़ा। अब क्या बोलूं? एक ठहाका लग जाएगा फिर जो कुछ बोलेंगे सब कुछ तेजी से दौड़ेगा।
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