जब हम पलक झपकाते हैं तो सामने अंधेरा क्यों नहीं आता

Mar 06, 2017
जब हम पलक झपकाते हैं तो सामने अंधेरा क्यों नहीं आता

जब हम आंखें बंद करते हैं तो हमारी आंखों के सामने अंधेरा आ जाता है परंतु जो हम पलक झपकाते  हैं तो हमारी आंखों के सामने बिल्कुल भीअंधेरा नहीं छाता है वैज्ञानिकों ने इसके बारे में कुछ पता किया है कि आख़िर में ऐसा क्यों होता है कि जब हम कुछ सेकंड के लिए पलकेझपकाते  हैं उस समय हमारी आंखों के सामने एक सेकेंड के लिए भी अंधेरा नहीं छाता है और इस दौरान हमारी नजरें भी इधर से उधर बिल्कुलनहीं होती।

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी,सिंगापुर के ननयांग तकनीकी विश्वविद्यालय  की करेनट बायोलोजी पत्रिका में खोजकर्ताओं ने लिखा हैकि जब हमारी आंखें बंद होती हैं या 1 सेकंड के लिए हमारी पलक झपकती है तो आंखों के इस खेल के सामने अंधेरा नहीं चाहता है। हम जहांदेख रहे होते हैं पलक उठाने के बाद हमारी नजरें वही होती हैं।

उन्होंने बताया कि हमारा दिमाग हमेशा कसरत ही करता रहता है कुछ ना कुछ उसमें चलता ही रहता है और इसके अलावा वह हमारी आंखों मेंनमी बनाए रखने के लिए और जलन से बचाए रखने के लिए यह पलक को झपकाता  रहता है। और कुछ खोजकर्ताओं ने जोकि सिंगापुर के हैंवहां के प्रोफेसर ने कहा कि हमारी आंखों की पलके बहुत ही आलसी होती है।

इस बात पर हम ध्यान तो नहीं देते परंतु होता यूं है कि हमारा दिमाग हमेशा यह कोशिश करता है कि जब हम पलकें झपकाए और उसके बादउनको उठाए तो हमारी नजर जहां देख रही होती है वही देखे। उसके लिए वह बहुत मेहनत करता है और अपने मोटर सिग्नल में लगातार इस कोअनुकूल बनाए रखता है। ताकि उसकी आंखें जहां देख रही थी वह बाद में भी वही देखें।

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