यूएपीए के आरोपों से बरी कोबाड गांधी, जालसाजी का दोषी ठहराए गए

Jun 11, 2016

माओवादी विचारक कोबाड गांधी को दिल्ली की एक अदालत ने प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का कथित तौर पर सदस्य होने के लिए कठोर गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून के तहत गंभीर आरोपों से बरी कर दिया.

हालांकि, अदालत ने उन्हें फर्जी पहचान का इस्तेमाल करके रहने के लिए दोषी ठहराया.  अदालत ने आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के साथ पढ़ते हुए धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 468 (जालसाजी) समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और कारावास की सजा सुनाई, जिसे वो मामले की सुनवाई के दौरान पहले ही काट चुके हैं.

अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि 68 वर्षीय गांधी मामले के लंबित रहने के दौरान तकरीबन साढ़े छह साल तक जेल में थे.

अदालत ने कहा, ‘‘गांधी 20 दिसंबर 2009 से हिरासत में हैं, जो तकरीबन साढ़े छह साल है. इसलिए मैं उन्हें पहले ही जेल में गुजारी जा चुकी अवधि के लिए सजा सुनाता हूं.’’  अदालत ने उनपर 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया.

गांधी प्रतिष्ठित दून स्कूल और मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज के पूर्व छात्र हैं. वह देश के विभिन्न हिस्सों में अपराध और आतंक के तकरीबन 20 मामलों में मुकदमे का सामना कर रहे हैं.

गांधी को यूएपीए के तहत आरोपों से बरी करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रीतेश सिंह ने गौर किया, ‘‘अभियोजन ने जिस भी साक्ष्य पर भरोसा किया है वह अदालत में स्वीकार्य नहीं है. अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में कमियां हैं.’’

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘आरोपी के बताने पर बरामद की गई सामग्रियों को बिना किसी संदेह के साबित नहीं किया जा सका है. कोबाड गांधी के खुलासा करने वाले बयान को साक्ष्य के तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता है—क्योंकि यह पुलिस अधिकारी को दिया गया है.’’

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर यूएपीए की धारा 20 और धारा 38 के तहत अभियोजन पक्ष की बातों पर तर्कसंगत संदेह है.’’

काल्पनिक नाम रखने और जाली पहचान का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें दोषी ठहराते हुए अदालत ने कहा, ‘‘यह सही है कि अभियोजन पक्ष इस बात को साबित करने में सफल रहा है कि गांधी काल्पनिक नाम रखकर दिल्ली में रह रहे थे और उनके पास जाली दस्तावेज था.’’

अदालत ने कहा, ‘‘ये परिस्थितियां गंभीर संदेह को जन्म देती हैं कि वह अपना पता लगने से खुद को बचाना चाहते थे. संदेह हालांकि गहरा हो सकता है लेकिन इसकी बराबरी उस तथ्य के सबूत के साथ नहीं की जा सकती है. गांधी की उस प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता और जुड़ाव को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने जिस सामग्री पर भरोसा किया है वह भरोसेमंद नहीं है और साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है–.’’

अदालत ने कहा, ‘‘गांधी जाली पहचान के साथ काल्पनिक नाम रखकर दिल्ली में रह रहे थे. हालांकि, जाली पहचान का इस्तेमाल करने और उस प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता के बीच की खाई को संदेह के आधार पर नहीं भरा जा सकता.’’

गांधी के अतिरिक्त अदालत ने राजिंदर कुमार उर्फ अरविंद जोशी को आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और धारा 420 (धोखाधड़ी) समेत कई धाराओं के तहत अपराध का दोषी ठहराया. कुमार को जेल की सजा सुनाई गयी जो वह पहले ही मामले के दौरान काट चुके हैं. उन पर 20000 रूपये का जुर्माना भी लगाया गया.

पुलिस के अनुसार, गांधी कुमार द्वारा प्रदान किए गए फर्जी नाम और पहचान के आधार पर दिल्ली में रह रहे थे. कुमार खुद अपने असली नाम या पहचान का इस्तेमाल नहीं कर रहा था.

अभियोजन पक्ष ने इससे पहले दावा किया था कि गांधी को इस मामले में सितंबर 2009 में दक्षिण दिल्ली से प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो का कथित तौर पर सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पुलिस का आरोप था कि वह यहां नक्सल गतिविधियों के लिए कथित तौर पर अड्डा बनाने का प्रयास कर रहे थे और संगठन के मुख्य स्तंभ और विचारक थे.

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