SC ने कहा, एक संगठन की ‘सार्वजनिक रूप से निंदा’ नहीं करनी चाहिए थी, राहुल से कहा खेद जताए नहीं तो फिर…

Jul 19, 2016

मानहानि के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को कहा कि या तो माफी मांगिए या फिर मुकदमे का सामना कीजिए.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ टिप्पणी को लेकर चल रहे मानहानि के मामले में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को झटका लगा.
 उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि राहुल गांधी को एक संगठन की ‘सार्वजनिक रूप से निंदा’ नहीं करनी चाहिए थी और अगर उन्होंने खेद नहीं जताया तो उन्हें मानहानि मामले में मुकदमे का सामना करना पड़ेगा. राहुल ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था.
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की पीठ ने कहा, ‘‘हमारा यह मानना है कि यह ऐतिहासिक रूप से सही हो सकता है लेकिन तथ्य या बयान लोगों की भलाई के लिए होना चाहिए. आप सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं कर सकते.’’
पीठ ने कहा कि ‘‘स्वतंत्रता को दबाया या कुचला नहीं गया है. मानहानिपूर्ण बयान पर अंकुश लगाया गया है. लेखक, नेता, आलोचक या विपक्षी क्या कहते हैं, आप में उसे सहन करने की महान क्षमता होनी चाहिए.’’
पीठ ने राहुल के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य जताया कि ‘‘उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उद्धरण देकर भाषण क्यों दिया.’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उन्होंने अपने विवेक से काम लिया है और राहुल गांधी को मामले में मुकदमे का सामना करना होगा.
पीठ ने कहा, ‘‘हमें देखना है कि याचिकाकर्ता के आरोप भादंसं की धारा 499 (मानहानि) के तहत आते हैं या नहीं. फैसला हो चुका है. अगर आपने खेद नहीं जताया तो आपको मुकदमे का सामना करना होगा.’’
इसने यह भी कहा, ‘‘कानून का मकसद लोगों को वादी बनाना नहीं है. कानून का उद्देश्य है कि लोग कानून का पालन करें. अराजकता के बजाए शांति और सौहार्दता का वातावरण हो.’’
राहुल की तरफ से वरिष्ठ वकील हरीन रावल पेश हुए जिन्होंने कहा कि भाषण में जो भी कहा गया वह सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर कहा गया और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्णय के आधार पर कहा गया. रावल ने कहा कि वह सीधे तौर पर आरएसएस का जिक्र नहीं कर रहे थे.
पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ने के बाद कहा कि इसमें केवल इतना कहा गया है कि नाथूराम गोडसे आरएसएस का कार्यकर्ता था. पीठ ने कहा कि गोडसे ने गांधी को मारा और आएसएस ने गांधी को मारा, दोनों अलग-अलग बात है.
इसने कहा, ‘‘आप इससे काफी आगे बढ़ गए और आप सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं कर सकते.’’
न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि ‘‘इतिहास निजता का सबसे बड़ा दुश्मन है. कई वर्षों से प्रयास हो रहा है कि ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हस्तियों के जीवन में प्रवेश कर उसे नया आयाम दिया जाए.’’
डीएमडीके नेता और अभिनेता ए. विजयकांत द्वारा दायर याचिका में हाल के एक फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि सरकार की आलोचना एक बात है और ऐतिहासिक हस्तियों की आलोचना दूसरी बात है. विजयकांत ने याचिका में अपने एवं अन्य के खिलाफ दायर मामलों को चुनौती दी थी जिसमें उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को नोटिस जारी किया है.
इसके बाद रावल ने दो हफ्ते के स्थगन की मांग करते हुए कहा कि वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल इस मामले में जिरह करेंगे और आज (मंगलवार को) वह उपलब्ध नहीं हैं. उन्होंने प्रत्युत्तर दायर करने की भी मांग की.
बहरहाल पीठ ने स्थगन देने के आग्रह से इंकार कर दिया और मामले की सुनवाई 27 जुलाई तय की और कहा कि मामले में और स्थगन नहीं दिया जाएगा.
राहुल ने पिछले वर्ष मई में उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उनके खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि के मामले को खारिज करने की मांग की थी. मामला महाराष्ट्र के ठाणे जिले के भिवंडी में मजिस्ट्रेट की अदालत के समक्ष लंबित है.
उच्चतम न्यायालय ने मजिस्ट्रेट की अदालत में मामले की सुनवाई पर अंतरिम रोक लगा दी थी.
राहुल ने इससे पहले अपने बयान पर खेद जताने के उच्चतम न्यायालय की सलाह को मानने से इंकार कर दिया था और कहा था कि वह मुकदमा लड़ेंगे. न्यायालय ने मामले को बंद करने के लिए उन्हें खेद जताने की सलाह दी थी.
धारा के तहत मानहानि के अपराध में दो वर्ष जेल तक की सजा हो सकती है.

आएसएस की भिवंडी इकाई के सचिव राजेश कुंटे ने आरोप लगाया था कि राहुल ने छह मार्च 2015 को सोनाले में एक चुनावी रैली के दौरान कहा कि ‘‘आरएसएस के लोगों ने गांधीजी की हत्या की.’’
उन्होंने कहा है कि कांग्रेस नेता ने अपने भाषण में संघ की छवि को खराब करने का प्रयास किया.
शिकायत के बाद मजिस्ट्रेट की अदालत ने कार्यवाही शुरू की और राहुल को नोटिस जारी कर पेश होने को कहा. राहुल को इस वर्ष छह जनवरी को निचली अदालत ने पेश होने के लिए समन किया.
कांग्रेस नेता ने उच्च न्यायालय से गुहार लगाई कि उन्हें पेशी से छूट दी जाए और शिकायत को रद्द कर दिया जाए.
अभियोजन ने याचिका का विरोध किया था और कहा कि राहुल अपने मामले में जिरह कर सकते हैं और मजिस्ट्रेट के समक्ष सुनवाई के दौरान साक्ष्य दे सकते हैं.
उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया था और अपने आदेश पर स्थगन देने से इंकार कर दिया. इसने कांग्रेस नेता को अनुमति दी कि आदेश के खिलाफ वह उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकते हैं. पिछले वर्ष मई में उन्होंने उच्चतम न्यायालय से अपने बयान के मामले में दर्ज आपराधिक मुकदमे को रद्द करने की मांग की थी.
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