सबरीमला मंदिर मामले को संविधान पीठ में भेजने पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

Jul 12, 2016

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संकेत दिये कि वह ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में दस से 50 साल के उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी की सदियों पुरानी परंपरा के मुद्दे को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज सकता है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा मसला है.न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि महिलाओं को संविधान के तहत अधिकार मिले हैं और अगर यह मामला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजा जाता है तो वह इस मामले में विस्तृत आदेश देगी.

पीठ ने कहा, हम सोचते हैं कि इसे संविधान पीठ के पास भेजने की जरूरत है. इस पीठ में न्यायमूर्ति सी नागप्पन और न्यायमूर्ति आर भानुमति भी शामिल थे. पीठ ने इस मामले में आगे की सुनवाई के लिए सात नवंबर की तारीख तय की.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं पर ये बैन कैसे लगाया जा सकता है, जबकि महिला और पुरुष के बीच ऐसा कोई भेदभाव वेद, उपनिषद या किसी शास्त्र में नहीं है. वहीं इस मामले में संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट फैसला लेगा.

इसे चुनौती देने वाली याचिका पर जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई की. तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि मंदिर पूजा का सार्वजनिक स्थल है. यहां महिलाओं को प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता है.

मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मंदिर बोर्ड और सरकार से पूछा है कि सबरीमाला मे महिलाओं का प्रवेश कब बंद हुआ. इसके पीछे क्या इतिहास है.

कोर्ट इस मामले में ये देखना चाहता है कि समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के होते हुए यह रोक कहां तक उचित है। कोर्ट दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाना चाहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जवाब के लिए 6 हफ्ते का वक्त दिया था और वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन और के रामामूर्ति को कोर्ट का सहायक नियुक्त किया था। हालांकि मंदिर बोर्ड ने कहा था कि ये प्रथा एक हजार साल से चल रही है। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले को क्यों उठा रहा है, सिर्फ सबरीमाला ही नहीं बल्कि पूरे सबरीमाला पर्वत पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है.

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