प्रधानमंत्री यहां भी अपनी मन की बात कहने से नहीं चूके

Aug 17, 2017
प्रधानमंत्री यहां भी अपनी मन की बात कहने से नहीं चूके

यकीनन विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और 21वीं सदी के भारत के बेहद लोकप्रिय प्रधानमंत्री का जश्न-ए-आजादी पर लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण भले ही उनके वादे के मुताबिक अब तक का सबसे छोटा रहा, लेकिन दृष्टि साफ-साफ युवाओं को लुभाने वाली थी। उनके न्यू इंडिया का संकल्प और देश में परिवर्तन की बात के मायने बहुत गहरे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हम जिस निराशा में पले बढ़े हैं, अब हमें आत्मविश्वास से आगे बढ़ना है। हमें निराशा को छोड़ना है। चलता है ये तो ठीक है, अरे चलने दो, मैं समझता हूं कि चलता है का जमाना चला गया। अब तो आवाज यही उठे कि बदला है, बदल रहा है, बदल सकता है।”

व्यवस्थाओं में बदलाव की कोशिशों और नतीजों पर अनकहे ही नरेंद्र मोदी ने देश के लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या जिसकी आयु 35 वर्ष से कम है, को छुआ है।

उन्होंने कहा, “न्यू इंडिया जो सुरक्षित हो, समृद्ध हो, शक्तिशाली हो, न्यू इंडिया जहां सबको समान अवसर प्राप्त हो।” हमेशा की तरह नया फॉर्मूला था। इस भाषण में समस्याओं से लंबी उपलब्धियों की फेहरिस्त थी।

हालिया घटनाओं की चर्चा से शुरुआत कर अपनी संवेदनाओं और नाराजगी को अनकहे जाहिर करते हुए गोरखपुर में 60 बच्चों की मौतों पर चिंता। वहीं कश्मीर की समस्या पर ‘न गाली से न गोली से, कश्मीर की समस्या सुलझेगी गले लगाने से।’ कहकर आतंकवादियों से मुख्य धारा में आने का आह्वान भी किया और नर्मी से इंकार कर बड़ी चेतावनी भी दे डाली। काश ड्रैगन की ढिठाई पर साफ कहते तो सोने में सुहागा जैसे होता।

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भाषण में जहां बार-बार जीएसटी की चर्चा की वहीं नोटबंदी की उपलब्धियों, किसानों के आने वाले अच्छे दिन और तीन तलाक जैसे संवदेनशील मुद्दे पर भी अपनी बात कह एक तीर से कई निशाने साधे। सधे हुए अंदाज में बेबाकी से प्रभावी बात कहने की पहचान बना चुके प्रधानमंत्री यहां भी अपनी मन की बात कहने से नहीं चूके।

उन्होंने कहा, “वर्ष 2018 की एक जनवरी सामान्य नहीं होगी। जिन लोगों ने 21वीं शताब्दी में जन्म लिया है, उनके लिए बहुत अहम है। यह वर्ष उनके जीवन का निर्णायक होगा, क्योंकि 21वीं सदी के भाग्य विधाता होंगे। इन सभी नौजवानों का मैं हृदय से स्वागत करता हूं। आपको देश के भाग्य निर्माण का अवसर मिल रहा है। देश आपको निमंत्रण देता है।” इसके राजनीतिक मायने बहुत साफ हैं। निश्चित रूप से बड़ी संख्या में नौजवान वोटर बनेंगे और उनके लिए 2019 का आम चुनाव पहला होगा।

स्वाभाविक है इतने पहले ही ऐसा भावुक आह्वान किसलिए है कहने की जरूरत नहीं। वैसे भी युवाओं में नरेंद्र मोदी के प्रति अभी जबरदस्त आकर्षण है। लेकिन उन्होंने इससे भी आगे बढ़कर अपनी एक अलग छवि दिखाई। भाषण के फौरन बाद बच्चों के बीच में जाकर ऐसे घुले-मिले मानों खुद भी बच्चे हों। निश्चित रूप से इस समय लोगों को चाचा नेहरू जरूर याद आए होंगे, लेकिन यह बड़ी दूर की कौड़ी है।

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इससे 10-15 वर्ष के बच्चों, उनके अभिभावकों और भाव विभोर अनगिनत देशवासियों में पल भर में वो जगह बनाई जो सबके बस में नहीं। यकीनन नई पौध के भावी मतदाताओं से सीधा जुड़ाव तो है ही उससे भी ज्यादा इसके राजनीतिक फायदे मिलने तय हैं।

इधर सर्वोच्च न्यायालय परिसर में भारत के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर का भाषण भी अहम था।

उन्होंने संविधान के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की चर्चा करते हुए भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की सराहना की और कहा, “हमारे राष्ट्रपति दलित परिवार से आते हैं। प्रधानमंत्री कभी चाय बेचते थे। वो स्वयं केन्या के नागरिक के तौर पर जन्मे, लेकिन आज भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं। यही स्वतंत्रता है जहां हर कोई साथ है, समान है। जब आप स्वतंत्र होते हैं तभी हर चीज पा सकते हैं। निश्चित रूप से भारत की यही विविधता है।” लेकिन एक सवाल अहम है कि चुनौतियों से बढ़कर भ्रष्टाचार से निपटने और नीतियों का सही-सही अनुपालन कराने में कितना वक्त और लगेगा?

19 वर्ष पहले दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था, “दिल्ली से एक रुपया भेजता हूं और जमीन पर 15 पैसे ही पहुंचते हैं।”

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है कि दिल्ली से चला 100 रुपये सीधे करोड़ों गरीबों के बैंक खातों में जाए। ऐसा डिजिटल इंडिया दुनिया को दिखाना है। लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती स्वास्थ्य, शिक्षा, बेबस किसान, मानव जनित प्राकृतिक आपदाएं, आतंकवाद, नस्लीय हिंसा, धर्म का आवरण है, जिसके लिए कठोरता से कुछ अलग करना होगा।

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नदियों की स्वतंत्रता लौटानी होगी। तटबंध, बांध-बैराज तबाही के कारण क्यों बने? जानना होगा। अंग्रेजों ने दामोदर नदी को नियंत्रित करने, 1854 में उसके दोनों ओर बांध बनवाए, लेकिन 1869 में बांध को तोड़ दिया। उन्हें समझ आ गया कि प्रकृति से छेड़छाड़ ठीक नहीं। भारत में आखिरी दिनों तक किसी नदी को बांधने का प्रयास नहीं किया। फरक्का बैराज और दामोदर घाटी परियोजना विरोधी एक विलक्षण प्रतिभाशाली इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य की भावना को समझना होगा।

यकीनन सर्जिकल स्ट्राइक हमारी ताकत है, नोटबंदी ईमानदारी का उत्सव, 800 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति जब्ती बड़ी कामियाबी, लाखों कागजी कंपनियों का खात्मा बड़ा सुधार है। डिजिटल इंडिया और आधार लिंकिंग बड़ी तकनीकी सफलता है, लेकिन उससे भी जरूरी लोकशाही के मकड़जाल को तोड़कर योजनाओं और इमदादों को वाजिबों तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है। शायद इन्हीं सबसे निपटने का दर्द अनकहे ही 21वीं सदी के मतदाताओं से लालकिले की प्राचीर से कहकर प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 के लिए अपने अंतर्मन की बात कही हो।

ऋतुपर्ण दवे 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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