सकारात्मक बदलाव ‘पुरातन पद्धतियों, के जरिए नहीं आ सकते: प्रणब मुखर्जी

Jun 15, 2016

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अक्करा में संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, आईएमएफ जैसे वैश्विक संगठनों में सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा है कि सकारात्मक बदलाव ‘पुरातन पद्धतियों और सिद्धांतों’ के जरिए नहीं लाए जा सकते.

घाना विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैटेस्टिकल, सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च के छात्रों को कल संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के संदर्भ में स्थापित किया गया संयुक्त राष्ट्र व्यापक बदलावों से गुजर चुके है, आज का विश्व समुदाय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकता.

विश्व विद्यालय के खचाखच भरे सभागार में मौजूद छात्रों को संबोधित करते हुए मुखर्जी ने कहा कि जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था तब कुछ ही देश इसके सदस्य थे. लेकिन विश्वयुद्ध के बाद स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों की इस वैश्विक संस्था में कोई ‘‘प्रभावी भूमिका’’ नहीं है.

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उन्होंने कहा कि हम आर्थिक संस्थाओं,  विश्व बैंक आईएमएफ, डब्ल्यूटीआई..संयुक्त राष्ट्र की सबसे अहम सुरक्षा परिषद की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में अंतरराष्ट्रीय संरचना के तर्कसंगत सुधार की मांग कर रहे हैं.

मुखर्जी ने कहा कि यह विडंबना ही है कि जो भारत धरती के हर छठे नागरिक को अपने यहां जगह देता है और विकास के केंद्र अफ्रीकी महाद्वीप को, संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए कोई स्थान प्राप्त नहीं है.

मुखर्जी ने कहा, ‘‘क्या आप निर्णय लेने की पुरातन पद्धतियों वाले इन संस्थानों से आज के विश्व की समस्याएं सुलझाने की उम्मीद कर सकते हैं.”

उन्होंने यह भी घोषणा कि भारत सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम में घाना के लिए आवंटित सीटों की संख्या को 250 से बढ़ाकर 300 करने का फैसला किया है. इसके अलावा अन्य योजनाओं से मिलने वाली वाषिर्क छात्रवृतियों की संख्या को 20 से बढ़ाकर 40 कर दिया गया है.

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मुखर्जी ने कहा कि छह दशक पहले जब खुद को अंग्रेजों के 190 साल के शासन से मुक्त कराने पर भारत को जो कुछ मिला था, वह आज उससे पूरी तरह भिन्न है. राष्ट्रपति ने कहा कि अब भारत एक मजबूत देश है लेकिन यह रातों-रात नहीं हुआ है और ‘यह हमारे नेताओं की मेहनत और बलिदान की वजह से हुआ है.’

इससे पहले, मुखर्जी ने घाना के प्रथम राष्ट्रपति की याद में बनाए गए स्मारक कवामे नकरूमा की समाधि पर गए और वहां पुष्पचक्र  चढ़ाया.

राष्ट्रपति ने स्मारक और संग्रहालय का दौरा किया, जहां प्रथम राष्ट्रपति द्वारा इस्तेमाल की गई विभिन्न वस्तुएं रखी गई हैं. घाना के प्रथम राष्ट्रपति उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी.

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