सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे पर पी ए संगमा ने छोड़ी थी कांग्रेस

Mar 04, 2016

लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और मेघालय के तुरा संसदीय क्षेत्र से मौजूदा सांसद पुर्नो अगिटोक संगमा का शुक्रवार को नयी दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और मेघालय के तुरा संसदीय क्षेत्र से मौजूदा सांसद पुर्नो अगिटोक संगमा का शुक्रवार को नयी दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

संगमा का जन्म एक सितंबर 1947 को मेघालय के पश्चिम गारो हिल्स जिले के चपाथी गांव में हुआ था. सेंट एंथनी कॉलेज शिलांग से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद संगमा ने असम के डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की.

इसके बाद उन्होंने एलएलबी की डिग्री भी हासिल की. उनके परिवार में पत्नी सोरडनी के. संगमा और चार बच्चे हैं.

संगमा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. राजनीति में आने से पहले उन्होंने व्याख्याता, वकील और पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई. वर्ष 1973 में संगमा प्रदेश युवा कांग्रेस समिति के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. कुछ समय बाद ही वह इस समिति के महासचिव नियुक्त किए गए. वर्ष 1975 से 1980 तक वह प्रदेश कांग्रेस समिति के महासचिव रहे.

वर्ष 1977 के लोकसभा चुनावों में संगमा तुरा निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज करने के बाद पहली बार सांसद बने. चौदहवीं लोकसभा चुनावों तक वह लगातार जीतते रहे. हालांकि नौवीं लोकसभा (1989) में वह जीत दर्ज करने में असफल रहे. वह 1996 से 1998 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे.

वर्ष 1980-1988 तक संगमा केंद्र सरकार के अंतर्गत विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे. 1988-1990 तक वह मेघालय के मुख्यमंत्री भी रहे तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी राकांपा के सह संस्थापक थे. वह आठ बार लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं.

उनके राजनीतिक जीवन में ठहराव तब आया जब उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर तारिक अनवर और शरद पवार के साथ कांग्रेस से बगावत कर दी. वर्ष 1999 में कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद शरद पवार और तारिक अनवर के साथ मिलकर संगमा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना की.

हालांकि बाद में शरद पवार से भी मतभेद होने के बाद उन्होंने वर्ष 2004 में एनसीपी से अलग एक क्षेत्रीय पार्टी बनायी जो बाद में तृणमूल कांग्रेस के साथ मिल गयी. उसके बाद वह फिर से एनसीपी में शामिल हुए तथा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़े जिसमें उन्हें भाजपा, बीजू जनता दल, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के अलावा अन्य दलों का समर्थन प्राप्त था. हालांकि उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने राकांपा से इस्तीफा दे दिया था. दरअसल, पार्टी सुप्रीमो शरद पवार नहीं चाहते थे कि वह प्रणब मुखर्जी को इस पद के लिए चुनौती दें.

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