ओलंपिक पदक विजेता साक्षी, जीत की ये 5 सबसे अहम बातें

Aug 18, 2016

भारत के लिए रियो ओलंपिक में आखिरकार पदक का सूखा खत्म हो गया और इस सूखे को खत्म करने वाली है हरियाणा की पहलवान साक्षी मलिक। साक्षी ने महिला फ्रीस्टाइल के 58 किलोग्राम वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत को रियो में पहला पदक दिलाया। इस पहलवान ने साढ़े सात घंटों के अंदर पांच फाइट पूरी की और इनमें से चार में जीत दर्ज की।

साक्षी ने जो चार मुकाबले जीते उनमें आखिरी के पलों में उन्होंने विरोधी पहलवान को चारों खाने चित किया। पूरे देश को गर्वान्वित करने वाली साक्षी रियो आने से पहले ही कह चुकी थी कि वो मेडल जीतने के लिए जान लगा देगी और उसके मुकाबले देखकर आपको भी उसकी बातों पर यकीन हो जाएगा। साक्षी के बारे में यह पांच बातें जानना बहुत जरूरी हैं-

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1- साक्षी के पहलवानी में आने के पीछे उनके दादा जी का बड़ा हाथ है। साक्षी ने खुद बताया है कि उनके दादा जी पहलवान थे और उनके मेडल देखकर ही उनका मन इस खेल में आने के लिए करने लगा। हालांकि साक्षी की शुरुआत आसान नहीं थी और उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। साक्षी के बताया कि मुश्किल समय में उनके परिवार ने उनका पूरा साथ दिया और हमेशा उनका मनोबल बढ़ाया।

2- ओलंपिक में पदक जीतने वाली साक्षी पहली भारतीय महिला पहलवान भी बन गई हैं। उनसे पहले किसी भी महिला पहलवान ने ओलंपिक में पदक नहीं जीता है। वहीं कुल मिलाकर कुश्ती में यह भारत का चौथा पदक है। के.डी. जाधव 1952 में ब्रॉन्ज मेडल जीता था।

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इसके बाद 2012 ओलंपिक में सुशील कुमार ने सिल्वर और योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता था। 3- ओलंपिक खेलों में यह किसी महिला द्वारा जीता गया चौथा मेडल है। साक्षी से पहले कर्णम मल्लेश्वरी (वेटलिफ्टिंग), एम.सी. मैरीकॉम (बॉक्सिंग), सायना नेहवाल (बैडमिंटन) में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हैं।

4- साक्षी इससे पहले 2014 ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारत को मेडल दिला चुकी हैं। उन्होंने भारत के खाते में सिल्वर मेडल डाला था। इसके अलावा उन्होंने 2015 सीनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया था।

5- कुश्ती में घुसने के लिए साक्षी ने लड़कों से भी कुश्ती लड़ी है। उन्हें शुरुआती दौर में समाजिक दबाव का भी सामना करना पड़ा कि लड़कियां पहलवानी नहीं करती हैं। लेकिन इस दौरान उन्हें अपने घरवालों का साथ मिला और साक्षी ने सारी आलोचनाओं को पीछे छोड़ते हुए कुश्ती के दांव-पेंच कोच ईश्वर दाहिया से सीखे। 2002 में उन्होंने दाहिया के अंडर कोचिंग शुरू की।

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