कभी “पीली बत्ती की गाड़ी में चलना,अधिकारियों को हुक्म देना”,अब फुटपाथ पर बेच रहीं बीड़ी और सिगरेट

May 05, 2016

श्योपुर। राजनीति में राजा कब रंक बन जाए और रंक कब राजा ये कोई नहीं जानता। जब तक जनप्रतिनिधियों के पास कुर्सी होती है पार्टी से जुड़े लोग इनके आगे-पीछे लगे रहते हैं। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में देखने को मिला है।

कभी एसी ऑफिस में बैठ कर अधिकारियों को हुक्म देना, पीली बत्ती की गाड़ी में चलना। सुरक्षा के लिए चारो तरफ बॉडीगार्ड तैनात थे। वही महिला आज गांव में अपने घर के सामने खटिया पर छोटी-सी दुकान लगाकर बिस्किट बेच कर अपना जीवनयापन कर रही है।

हम बात कर रहे हैं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष एवं वर्तमान में कराहल जनपद की सदस्य गुड्डी बाई आदिवासी की। भाजपा नेता गुड्डी बाई आदिवासी ने साल 2010 में जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतकर श्योपुर जिला पंचायत की अध्यक्ष बनीं थी। 26 मार्च 2015 तक गुड्डी बाई अध्यक्ष रहीं। वर्तमान में गुड्डी बाई कराहल जनपद के रानीपुरा भोटूपुरा वार्ड से जनपद सदस्य हैं।

कहते हैं एक बार जिला पंचायत अध्यक्ष रहने के बाद किसी भी नेता के दिन फिर जाते हैं। लेकिन गुड्डीबाई की हालत नहीं बदली और ने अब सेसईपुरा स्थित अपने घर के बाहर एक छोटी सी दुकान खोल कर अपना जीवनयापन कर रही हैं।

गुड्डीबाई की दुकान किसी गुमठी या पक्के भवन में नहीं, बल्कि एक टूटी-फूटी खटिया पर है। वह बच्चों की गोली, बिस्किट, बीड़ी और सिगरेट जैसी छोटी-मोटी चीजें बेच रही हैं। गुड्डीबाई की दुकान में बमुश्किल 400 से 500 रुपए का सामान होगा। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह महिला कभी जिला पंचायत अध्यक्ष रही होगी। गुड्डीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थी, फिर भी उनके काम में कोई परिजन या रिश्तेदार दखल नहीं देता था। पांच साल तक उन्होंने अपनी दम पर सफलता पूर्वक जिला पंचायत का कार्य किया।
श्योपुर में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। 10 सदस्यों वाली श्योपुर जिला पंचायत में कम से कम दो प्रत्याशी तो अध्यक्ष की दौड़ में होते हैं। ऐसे में बचे हुए 8 सदस्यों के वोट पाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किया जाता है। गुड्डीबाई ने करोड़ों रुपए की यह कुर्सी मुफ्त में पाई। उस समय अध्यक्ष का पद महिला आदिवासी का था और गुड्डीबाई अकेली थी जो आदिवासी महिला थी। इसलिए उन्हें निर्विरोध ही अध्यक्ष बना दिया गया।

पार्टी में भी पूछ-परख कम हो गई
जब गुड्डीबाई अध्यक्ष थीं, तब उन्हें पार्टी के नेताओं से लेकर अफसर तक सलाम करते और खूब तवज्जो देते थे। भाजपा का कोई भी छोटा बड़ा आयोजन होता था उसमें गुड्डीबाई विशिष्ट अतिथियों में शामिल होती थीं। मंच पर बैठती थीं।

कई आयोजनों में वह मुख्य अतिथि हुआ करती थीं, लेकिन अब कुर्सी नहीं है तो उन्हें पार्टी में भी उतना नहीं पूछा जाता। एक साल में कई आयोजन ऐसे हो गये, जिनमें गुड्डी बाई को बुलाया तक नहीं गया। दूसरी तरफ प्रशासन ने भी अपने आयोजनों में गुड्डीबाई से किनारा सा ही कर लिया है।

आदिवासी महिलाओं के लिए नहीं राजनीति
ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ है। इससे पहले और भी कई मामले हैं, जिनमें आदिवासी जनप्रतिनिधियों खासकर महिलाओं के कुर्सी से उतरते ही उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। कराहल जनपद की अध्यक्ष रही पिंकी आदिवासी जब तक कुर्सी पर रहीं, तबतक उन्हें उनकी पार्टी कांग्रेस में खूब सम्मान मिला। तब पिंकी आदिवासी राजनीति का चेहरा सा बन गई थी। उनके विधायक तक के चुनाव लड़ने के आसार बना दिए गए थे, लेकिन अब पिंकी आदिवासी राजनीति से विलुप्त हैं। ग्राम पंचायत में सचिव की नौकरी कर रही हैं।

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