‘रॉ’ के लिए करते थे जेम्‍स बांड सरीखा काम, अब गरीबी में जीने को मजबूर

May 13, 2016

गुरदासपुर। पंजाब के गुरदासपुर जिले में स्थित दादवां गांव में रिक्शा चलाकर डेनियल मसीह एक दिन में 150 रुपये कमाते हैं। उनकी पत्नी भी इतना ही घरों में काम कर कमा लेती हैं। कभी भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए जेम्स बांड की तरह का काम करने वाले डेनियल कारों व ग्लैमरस लाइफ से कोसों दूर अपने तीन बच्चों व पत्नी के साथ एक छोटे से कमरे में जीवनयापन करने को मजबूर हैं।

पूर्व जासूस और गरीबी का नाता कोई एकलौता डेनियल से ही नहीं है। पंजाब विशेषकर यहां के दादवां गांव में डेनियल जैसे लोग भरे पड़े हैं जिन्होंने देश के लिए जेम्स बांड सरीखा काम किया था, पर अब उनकी हालत दयनीय है। कुछ हजार रुपयों के लिए जिंदगी को जोखिम में डालने और पाकिस्तानी जेल में कई-कई साल तक कैद में रहने वाले ये हिम्मती लोग अब गरीबी में जीवन यापन को मजबूर हैं, क्योंकि देश में इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया है।

डेली मेल के अनुसार, 48 वर्षीय डेनियल ने बताया कि भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के लिए करीब दर्जनों बार जिंदगी को खतरे में डाल पाकिस्तान गए। डेनियल मसीह जो अब रिक्शा चलाते हैं, ने कहा,’ नक्शों व पुल की तस्वीरें लाने का काम मुझे सौंपा गया था।‘ 1993 में उन्हें पड़ोसी देश ने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था लेकिन चार साल के बाद रिहा कर दिया गया। डेनियल ने कहा वापस भारत आने के बाद यहां के अधिकारियों ने मात्र 15,000 रुपये दिए।

उन्होंने कहा, ‘डेरा बाबा नानक सेक्टर से मैं 10-12 बार पाकिस्तान गया और तीन दिन पर लौट आया करता था हर दौरे के लिए 3,000 रुपये दिए जाते थे।‘

हाल ही में क्रिश्चन का धर्म अपना लेने वाले डेनियल ने कहा कि पाकिस्तान में चार साल के दौरान उन्हें नारोवल, सियालकोट, लाहौर और रावलपिंडी में रखा गया था। पूछताछ के दौरान डेनियल को काफी यातनाएं दी जाती थीं लेकिन उसने इस बात का खुलासा नहीं किया कि वे सीक्रेट एजेंट थे।

पकड़े जाने के बाद एजेंसियां इन्हें पैसे देना बंद कर देती है। इनकी पत्नियां व बच्चे गरीबी में जी रहे हैं। अब ये मजदूरों, कुली, रिक्शा चालकों और अन्य घरों में नौकरों की तरह काम कर कमाई करते हैं।

डेनियल के पड़ोसी 50 वर्षीय डेविड ने कहा, ‘मुझे पाकिस्तान के लखपत कोट जेल में काफी क्रूर यातनाएं दी गयी। 1999 में रिहाई के तुरंत बाद मैं लकवाग्रस्त हो गया। पिछले दस वर्षों से मैं तिल-तिल कर मर रहा हूं। मेरी मदद को कोई नहीं आया। इस काम के लिए न कोई पेंशन न कोई चिकित्सा की मदद है।‘

गुरदासपुर का दादवां ‘जासूसों के गांव’ के तौर पर जाना जाता है। इस क्षेत्र में बेरोजगारी चरम पर है। अधिकांश को अच्छे काम के वादे का लालच दे जासूसी का काम दिया जाता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान की सीमा से सटे पंजाब में खुफिया एजेंसियां नियमित रूप से गरीब परिवारों के लोगों को जासूसी के कामों के लिए नियुक्त करती है।

दो बार गिरफ्तार हो चुके 50 वर्षीय सुनील ने कहा, ‘मैं जासूस के तौर पर काम करने का इच्छुक नहीं था। अधिकारियों ने मुझपर दवाब बनाया। जब मैं पाकिस्तान में धरा गया उस दौरान मेरे परिवार को देखने कोई नहीं आया। अपने हाथों व कमर पर जख्म को दिखाते हुए उसने कहा कि वे मुझे जानवरों की तरह यातनाएं देते थे। बदले में मुझे क्या मिला… कुछ नहीं। मेरे पास न पेंशन है न पैसा।‘

1999 में सियालकोट में सुनील को गिरफ्तार कर लिया गया था और 2006 में उसे छोड़ा गया। इसके बाद 2011 में वह रॉ के लिए दूसरे मिशन पर गया, तब उसे एक बार और पाकिस्तान में पकड़ लिया गया। इसके तीन साल बाद उसे छोड़ दिया गया।

दुखी सुनील ने कहा ‘क्या हम इस देश के नागरिक हैं? हमसे तो बेहतर तस्कर हैं कम से कम उन्हें पर्याप्त पैसे तो मिलते हैं और हमें देशभक्ति के लिए जख्म।‘ अब ऐसे अनेकों लोग न्याय और 2013 में लाहौर जेल में पंजाबी किसान सरबजीत की मौत का हर्जाना मांग कर रहे हैं।

सरबजीत मामले में रिहाई के लिए पॉपुलर कैंपेन के जरिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित हुआ और अब इस माह सरबजीत पर बनी फिल्म रिलीज होने वाली है।

सरबजीत की मौत के बाद पंजाब सरकार ने हर्जाने के तौर पर 1करोड़ से अधिक की रकम और उसकी बेटी को नौकरी के साथ परिवार को गैस एजेंसी उपलब्ध कराई। इसी तरह कथित भारतीय जासूस कृपाल सिंह की लाहौर के जेल में मौत के बाद उनके परिवार वालों को भी राज्य ने सुविधाएं दी।

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