ट्राई की सिफारिशों से टेलीकाम सेक्टर में हड़कंप

Jul 15, 2016
टेलीकॉम कंपनियों का मानना है कि रेगुलेटर की नई सिफारिशों पर अमल हुआ तो इसका असर स्पेक्ट्रम की नीलामी पर भी दिख सकता है।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई की ताजा सिफारिशों ने पूरे टेलीकॉम सेक्टर में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। स्पेक्ट्रम यूजर चार्जेज तय करने को लेकर ट्राई की नई सिफारिशों से पहले तय गी गई कीमत और यूजर चार्ज पर भी सवाल होने लगे हैं। टेलीकॉम कंपनियों का मानना है कि रेगुलेटर की नई सिफारिशों पर अमल हुआ तो इसका असर स्पेक्ट्रम की नीलामी पर भी दिख सकता है।

ट्राई ने हाल ही में अलग-अलग फ्रीक्वेंसी वाले स्पेक्ट्रम की रेवेन्यू अर्जन क्षमता के आधार पर यूजर चार्जेज तय करने का सुझाव दिया है। सरकार स्पेक्ट्रम की नीलामी में टेलीकॉम कंपनियों से लाइसेंस फीस के अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल पर शुल्क वसूलती है। अभी तक इसका निर्धारण टेलीकॉम सेवाओं से मिलने वाले रेवेन्यू के एक निश्चित हिस्से के आधार पर तय होता था। यह फॉर्मूला सभी फ्रीक्वेंसी के स्पेक्ट्रम के लिए समान रूप से लागू था। लेकिन अब ट्राई चाहता है कि प्रत्येक स्पेक्ट्रम बैंड की अलग से रेवेन्यू अर्जन क्षमता के आधार पर स्पेक्ट्रम यूजर चार्जेज तय किए जाए।

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जानकारों का मानना है कि ऐसा करने से भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी। तकनीकी तौर पर कम बैंड वाले स्पेक्ट्रम को सेवाओं के लिए तैयार करने पर कम खर्च आता है। इसीलिए कम बैंड के स्पेक्ट्रम की कीमत अधिक होती है। जबकि ऊंचे बैंड वाले मसलन 1800, 2100 और 2300 मेगाह‌र्ट्ज वाले स्पेक्ट्रम को विकसित करने के लिए मोबाइल कंपनियों को बुनियादी ढांचा तैयार करने पर अधिक निवेश करना होता है। इसलिए इन बैंड के स्पेक्ट्रम की कीमत कम होती है। इस फार्मूले को ट्राई पूर्व में कई बार दोहरा चुका है। मोबाइल कंपनी से जुड़े एक अधिकारी का मानना है कि अगर नया फॉर्मूला लागू होता है तो यह टेलीकॉम सेक्टर का गणित बिगाड़ देगा। इसका असर अगले दो-तीन महीने में होने वाली स्पेक्ट्रम नीलामी पर भी पड़ सकता है।

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