आतंकवाद और ओशोज्ञान, योग के जरिए हो सकता है समाधान

Jun 20, 2016
आज दुनिया के सामने आतंकवाद बड़ी चुनौती है। भारतीय मनीषियों ने इससे निपटने के रास्ते भी बताए हैं। योग के जरिए हम आंतरिक शुद्धिकरण कर सकते हैं।

बियॉन्ड सायकोलॉजी, भारत के जलते प्रश्न और देख कबीरा रोया में ओशो ने आतंकवाद और नक्सलवादी मनोविज्ञान पर विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने आतंकवाद के कारण और इसके समाधान का रास्ता भी बताया है। उनका मानना है कि योग के जरिए हम अपने आंतरिक शुद्धिकरण को बढ़ावा दे सकते हैं। आंतरिक विकारों की वजह से ही लोगों में उग्र होते हैं। सांसों पर नियंत्रण कर लोग अपने अंदर आसुरी शक्ति पर नियंत्रण कर सकते हैं।

मनुष्य और मनुष्यता को सभी धर्मों ने मिलकर मार डाला है। बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि हमारा धर्म ही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म है, जबकि सच ये है कि ऐसा कहने वाले खुद अपने धर्म को नहीं जानते हैं।

राजनीतिज्ञ धर्म का उपयोग करना अच्छी तरह जानते हैें। कट्टरपंथी लोग भी राजनीतिज्ञों का उपयोग करना सीख गए हैं। धर्म और योग का अविष्कार लोगों को कबिलाई संस्कृति से बाहर निकालकर सभ्य बनाने के लिए हुआ था लेकिन हालात यह है कि यही धर्म हमें फिर से असभ्य होने के लिए मजबूर कर रहा है।

सोवियत संघ के पतन के पूर्व 1986 में ओशो ने भविष्यवाणी की थी कि आतंकवाद विकराल रूप धारण करने वाला है। ओशो ने भविष्य में झांकते हुए कहा था कि ध्यान रहे कि आतंकवाद बमों में नहीं हैं। किसी के हाथों में नहीं है। वह अवचेतन में है। यदि इसका उपाय नहीं किया गया तो हालात बदतर से बदतर होते जाएंगे। लगता है कि सब तरह के अंधे लोगों के हाथों में बम हैं। और वे अंधाधुंध फेंक रहे हैं। हवाई जहाजों में, बसों और कारों में, अजनबियों के बीच…अचानक कोई आकर तुम पर बंदूक दाग देगा। और तुमने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था।

उपरोक्त वाक्य आज के हालातों में अक्षरश: सही साबित हो गए कि…अचानक कोई आकर तुम पर बंदूक दाग देगा। और तुमने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था । आतंकवाद के लिए ओशो पूरे समाज को दोषी मानते हैं। समाज बिखर रहा है और जल्द ही राजनीतिज्ञों और कंटरपंथीयों की वजह से असंतोष अपनी चरम सीमा पर होगा। ओशो मानते हैं कि आतंकवाद की बहुत-सी अंतरधाराएँ हैं। मूल में है इसके संगठित धर्म और राजनीति, इसी से उपजता है संगठित अपराध और आतंकवाद।

ओशो के अनुसार यह तभी बदलेगा जब हम आदमी की समझ को जड़ से बदलेंगे जो कि हिमालय लांघने जैसा कठिन काम है।क्योंकि वे ही लोग जिन्हें तुम बदलना चाहोगे, तुमसे लड़ेंगे। वे आसानी से नहीं बदलना चाहेंगे, लेकिन बदलने के रास्ते हैं।

ओशो के मुताबिक यह भी सोचने वाली बात है कि आणविक अस्त्रों की होड़ में सभी राष्ट्र पागल हो रहे हैं। पुराने हथियार अब एक्सपाइरी होते जा रहे हैं। ऐसे में चीन और अमेरिका जैसी सरकारें पुराने हथियारों को नष्ट करने की बजाय उन गरीब देशों को बेच रही है। जहां बाजार में इनका मिलना बहुत ही आसान है। आतंकवादियों और नक्सलवादियों के लिए इन्हें खरीदना आसान है और ये लोग इनका उपयोग करना भी भलीभांति जानते हैं।

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