कोलेजियम की बैठक से दूर रहे जस्टिस चेलमेश्वर

Sep 03, 2016
कोलेजियम की बैठक से दूर रहे जस्टिस चेलमेश्वर
मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर व अन्य मुद्दों पर विचार के लिए बुलाई गई कोलेजियम की बैठक से वरिष्ठ जज जे चेलमेश्वर दूर रहे।

नई दिल्ली (प्रेट्र)। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जे चेलमेश्वर गुरुवार को कोलेजियम की बैठक से दूर ही रहे। उनके भाग नहीं लेने के कारण इस बैठक को स्थगित करनी पड़ी। यह बैठक मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) व अन्य मुद्दों पर विचार के लिए बुलाई गई थी। मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर सहित सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जज कोलेजियम के सदस्य हैं। इसमें जस्टिस चेलमेश्वर भी शामिल हैं।

जस्टिस ठाकुर इसके अध्यक्ष हैं।राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को खारिज करने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर भी शामिल थे। केवल उन्होंने ही अधिनियम और संविधान के 99वें संशोधन को निरस्त करने वाले फैसले से असहमति जताई थी। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलेजियम प्रणाली अपारदर्शी और व्यापक जनसमुदाय की पहुंच से दूर है।

इसमें पारदर्शिता लाने की जरूरत है। न्यायधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की सर्वोच्चता की मान्यता संविधान की बुनियादी विशेषता है। अनुभव के स्तर पर यह दोषपूर्ण है।जस्टिस चेलमेश्वर ने मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर को भेजे गए तीन पृष्ठों के पत्र के जरिये कोलेजियम की बैठक में आने से असमर्थता जताई। कोलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता के अभाव के संबंध में जस्टिस चेलमेश्वर पहले भी असंतोष जाहिर करते हुए पत्र लिख चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण का फैसला लेने वाले कोलेजियम में मुख्य न्यायाधीश सहित पांच न्यायाधीश शामिल हैं। नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रक्रिया तय करने के लिए एमओपी को लेकर सरकार और शीर्ष न्यायपालिका के बीच तनातनी चल रही है।हाल ही में एक पीआइएल पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ा संदेश दिया था।

यह संदेश उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण पर कोलेजियम के फैसले नहीं लागू करने को लेकर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘न्यायाधीशों की नियुक्ति में अड़ंगा’ सहन नहीं किया जाएगा। यह भी कहा था कि ‘जवाबदेही निर्धारित’ करने के लिए अदालत हस्तक्षेप करेगी, क्योंकि न्याय प्रदान करने की प्रणाली ‘ध्वस्त’ हो रही है।

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