एम्स पहले 15 लाख रूपया जमा करे, फिर सुनेंगे अपील : सुप्रीम कोर्ट

Aug 02, 2016
सुप्रीम कोर्ट ने एम्स से कहा है कि वह पहले इलाज में लापरवाही के लिए पन्द्रह लाख रूपये जमा करे उसके बाद ही उसकी अपील आगे सुनी जाएगी।

माला दीक्षित, नई दिल्ली : इलाज में लापरवाही के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रतिष्ठित अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान (एम्स) से दो टूक कहा है कि वह पहले 15 लाख रुपये जमा कराए उसके बाद ही उसकी अपील सुनी जाएगी। एम्स ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी है। आयोग ने एम्स को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार मानते हुए मृतक के परिजनों को साढ़े 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

एम्स को ये आदेश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने दिए। कोर्ट ने एम्स के वकील आरके गुप्ता की दलीलें सुनने के बाद अपील पर नोटिस तो जारी कर दिया लेकिन शर्त लगा दी कि एम्स चार सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में 15 लाख रुपये जमा कराए इसके बाद ही उसकी अपील पर सुनवाई होगी। तय समय के भीतर रकम नहीं जमा कराई गई तो एम्स की विशेष अनुमति याचिका स्वत: खारिज हो जाएगी।

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अगर एम्स तय समय में रकम जमा करा देता है तो उसके बाद रजिस्ट्री प्रतिपक्षी (मृतक की बेटी) को छह सप्ताह में जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस भेजेगी। इतना ही नहीं, मृतक की बेटी को सिक्योरिटी देकर वह रकम निकाल सकती है। इस मामले में 24 अक्टूबर को फिर सुनवाई होगी। कोर्ट ने कहा है कि अगर एम्स तय समय में पैसा जमा करा देता है तो मुआवजे की बाकी रकम अदा करने के राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के आदेश पर अंतरिम रोक लग जाएगी।

एम्स की दलील

एम्स के वकील राजकुमार गुप्ता की दलील थी कि आयोग का आदेश गलत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अपने पूर्व आदेश में कह चुका है कि इलाज में लापरवाही के मामले में नोटिस जारी करने से स्वतंत्र जांच रिपोर्ट मंगा कर देखी जानी चाहिए। इस मामले में आयोग ने ऐसा नहीं किया। जैकब मैथ्यू मामले में कोर्ट यह भी कह चुका है कि कोई भी समझदार डाक्टर जानबूझकर इरादतन लापरवाही या कोई ऐसा काम नहीं करता जिससे मरीज को नुकसान पहुंचे क्योंकि उस डॉक्टर की साख भी दांव पर लगी होती है।

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गुप्ता का कहना था कि गलती एम्स की नहीं है बल्कि मरीज की है। मरीज को तीन महीने पहले बता दिया गया था कि उसकी दिल की धमनियां बंद हो गई हैं, उसका ऑपरेशन कराना होगा। इसके लिए उसे 70 हजार रुपये और छह यूनिट खून जमा कराना था लेकिन मरीज तीन महीने तक वापस नहीं लौटा। इस बीच उसकी हालत और खराब हो गई। उसे दिल का दौरा भी पड़ा और बाद में जुलाई, 1997 में पड़े दिल के दौरे में उसकी मौत हो गई।

क्या कहा है आयोग ने

आयोग ने एम्स को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि इलाज करने वाले एम्स के डॉक्टरों को अच्छी तरह मालूम था कि मरीज की हालत गंभीर है और उसे दिल का दौरा पड़ा है, फिर भी उसे बेड न होने के आधार पर डेढ़ घंटे बाद ही सफदरजंग अस्पताल रिफर कर दिया गया। उसे जीवनरक्षक उपकरणों से लैस एंबुलेंस भी नहीं उपलब्ध कराई गई।

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आयोग ने कहा कि एम्स में इलाज करने वाले दिल के डॉक्टर ने मरीज को थ्रोम्बोलिसिस करने की सलाह दी थी लेकिन बेड न होने के आधार पर मरीज को ये इलाज नहीं दिया गया। जबकि थ्रोम्बोलिसिस थेरेपी ट्राली बेड पर भी दी जा सकती थी। आयोग ने एम्स को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार मानते हुए एम्स के खिलाफ शिकायत दाखिल करने वाली मृतक की बेटी को 6 फीसद ब्याज के सहित साढ़े 25 लाख रुपये मुआवजा अदा करने का आदेश दिया।

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