पहले देते पर्यावरण बचाने की सीख फिर पड़ाते हे नमाज

Apr 29, 2016

हैदराबाद। तपती धूप का मुकाबला करते हुए लोग इबादत करने के लिए धीरे-धीरे पुरानी शाही मस्जिद में इकट्ठे हो रहे हैं। कुछ वजू करने के लिए आगे बढ़ते हैं तो कुछ वजू करने के बाद पश्चिम दिशा में मुंह करके नमाज पढ़ने की तैयारी करते हैं।

प्रार्थना अभी शुरू ही हुई है। पारंपरिक तौर पर अरबी भाषा में अल्लाह और पैगंबर मोहम्मद की प्रशंसा् के बाद खतीम अहसान बिन मोहम्मद अल हमूमी उर्दू में बोलने लगते हैं। लोगों को लगता है कि वह इबादत को आगे बढ़ाएंगे लेकिन वह पर्यावरण संरक्षण की अहमियत के बारे में बोलकर लोगों को चौंका देते हैं।

हमूमी वहां मौजूद तकरीबन 5,000 लोगों से कहते हैं,’कुरान में कहा गया है कि जो पर्यावरण बचाने की दिशा में काम करेगा वह जन्नत के एक कदम और करीब आ जाएगा। पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदार इंसानों के कन्धे पर ही है। सभी जीवों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा की जानी चाहिए और अगर कोई लालचवश इसे नुकसान पहुंचाता है को वह भगवान के प्रति गुनाह कर रहा है।’ वहां मौजूद सभी लोग उनकी बातें ध्यान से सुनते हैं।

इतना ही नहीं, हमूमी का यह भी मानना है कि धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से ध्वनि प्रदूषण होता है। टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा,’इस्लाम में दूसरों को असुविधा पहुंचाने की मनाही है। यह इस्लाम के उसूलों के खिलाफ है। मैंने अपने एक भाषण में इस बारे में भी बात की है।’ वह उम्मीद करते हैं कि अगर धार्मिक गुरु लोगों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर निर्देश दें तो लोग उनका पालन करेंगे।

32 साल के हमूमी ने इंग्लिश ऐंड फॉरन लैंग्वेजेज यूविर्सिटी से पढ़ाई की है। हाल ही में उन्होंने माइनॉरिटी वेलफेयर डिपार्टमेंट से गुजारिश की है कि मस्जिदों को धोने के बाद बचे पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा,’पानी के इस संकट वाले दौर में हमें ग्राउंड वाटर बचाने का लेवल बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए।’

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