मुखर्जी ने बताए आठ चरण भारत और चीन के बीच के मुद्दों को सुलझाने के लिए

May 26, 2016

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारत और चीन को सीमा के मुद्दे समेत विभिन्न चुनौतियों को ‘सूझबूझ’ और ‘विवेक’ के जरिए सुलझा लेना चाहिए.

भारत और चीन के भविष्य के आठ ‘स्तंभों’ को रेखांकित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरूवार को कहा कि दोनों देशों के बीच की विभिन्न चुनौतियों को ‘राजनीतिक सूझबूझ’ और ‘सभ्यतापरक विवेक’ के जरिए समग्र ढंग से सुलझा लेना चाहिए.

पेकिंग विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में भारत-चीन संबंधों के लिए ‘जनता की साझेदारी की दिशा में आठ कदमों’ का उल्लेख करते हुए मुखर्जी ने कहा कि चीन के साथ साझेदारी को मजबूत करने के लिए एक द्विदलीय प्रतिबद्धता है. उन्होंने कहा कि ‘विकास पर आधारित करीबी साझेदारी’ के लिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक समझ होना जरूरी है.’

उन्होंने कहा कि वह ‘जनता-केंद्रित रूख की नींव में इन आठ स्तंभों को लगाकर इस बात से आश्वस्त हैं कि हम दोनों देशों की जनता के साझा लाभ के लिए हमारे सहयोग को पर्याप्त ढंग से बढ़ा एवं मजबूत कर सकते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘इसे करने का एक तरीका राजनीतिक संवाद में वृद्धि लाना है. भारत में चीन के साथ संबंध को मजबूत करने के प्रति एक द्विदलीय प्रतिबद्धता है. हमारे नेताओं के बीच लगातार होने वाले संपर्क इसका प्रमाण हैं.’

‘भारत-चीन संबंध (जनता-केंद्रित साझेदारी की दिशा में आठ कदम) पर संबोधन देते हुए मुखर्जी ने कहा, ‘हमने ‘साझा आधार’ को विस्तार दिया है और अपने मतभेदों का प्रबंधन सीखा है. सीमा के सवाल के साथ-साथ कई चुनौतियां हैं, जिन्हें समग्र रूप से निपटाए जाने की जरूरत है.’

भारत और चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर मतभेद हैं. बीजिंग का कहना है कि सीमा विवाद 2000 किलोमीटर तक सीमित है और यह अरूणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे वह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है. वहीं भारत का कहना है कि इस विवाद के दायरे में पूरी वास्तविक नियंत्रऩ रेखा आती है और इसमें वह अक्सई चिन भी आता है, जिसपर 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने कब्जा कर लिया था.

राष्ट्रप्रमुख के तौर पर अपनी चीन की पहली अधिकारिक यात्रा पर आए मुखर्जी ने कहा कि पड़ोसियों के बीच समय-समय पर कुछ मुद्दों पर मतभेद उभरना स्वाभाविक ही है. ‘मैं इसे हमारी राजनीतिक सूझबूझ की परीक्षा मानता हूं, जब हमें हमारे सभ्यतापरक विवेक का इस्तेमाल करते हुए इन मतभेदों को दोनों पक्षों के आपसी संतोष तक सुलझाना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘दोनों पक्षों को इस उद्देश्य के साथ काम करना चाहिए कि हम अनसुलझी समस्याएं छोड़कर आने वाली पीढ़ियों पर बोझ न लाद दें. मुझे यकीन है कि इन मुद्दों का न बिगड़ना सुनिश्चित करके और आपसी चिंताओं के प्रतिसंवेदनशील बने रहकर हम अपने मतभेदों को न्यूनतम और सहमतियों को अधिकतम कर सकते हैं.’

अपने आठ सिद्धांतों के तहत उन्होंने उत्सवों और खेल संपर्क, डिजिटल प्रौद्योगिकी, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विशेष तौर पर कैलाश मानसरोवर एवं बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्राओं के जरिए दोनों देशों के युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया.

दोनों पक्षों के नागरिक समाजों के बीच का तालमेल और वैश्विक एवं विकास मुद्दों के प्रति साझा रूख दोनों देशों के लोगों को साझा लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में सहयोग करने एवं योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करेगा. वैश्विक एवं विकास मुद्दों के प्रति साझा रूख जी20, ब्रिक्स, पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन, एशियाई अवसंरचना एवं निवेश बैंक और शंघाई कोऑपरेशन फोरम में मजबूत सहयोग को सुगम बनाता है.

राष्ट्रपति ने कहा कि उभरती शक्तियां होने के नाते यह भारत और चीन की जिम्मेदारी है कि वे वैश्विक समृद्धि को समृद्ध बनाने पर समान रूप से ध्यान केंद्रित करें.

उन्होंने कहा, ‘हम दोनों ही एक पुनरूत्थानवादी, सकारात्मक ऊर्जा से युक्त, एक ‘एशियाई सदी’ का सृजन करने और आपस में हाथ मिलाने के अवसर के मुहाने पर खड़े हैं. यह काम आसान नहीं होगा. हमें संकल्प और धैर्य के साथ बाधाओं को पार करना होगा. इस सपने को सच करने के लिए हमें धैर्य रखना होगा. हम एकसाथ मिलकर ऐसा कर सकते हैं. यदि हम एक स्थायी मित्रता से हाथ मिला लेते हैं तो हम ऐसा कर सकते हैं.’

अपने चार दिवसीय प्रवास के दौरान राष्ट्रपति अपने चीनी समकक्ष शी चिनफिंग और अन्य शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे.

साझा हित वाले क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों में आ रही विविधता पर खुशी जाहिर करते हुए मुखर्जी ने कहा कि चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

मुखर्जी ने कहा, ‘‘हमारे विकास संबंधी अनुभव एक दूसरे के लिए बेहद प्रासंगिक हैं. अवसंरचना, परिवहन, ऊर्जा, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और शहरीकरण में हमारी उपलब्धियां आपस में आदान-प्रदान और सहयोग के लिए एक उपजाऊ जमीन देती हैं. हमारे रक्षा एवं सुरक्षा आदान-प्रदान में अब वाषिर्क सैन्य अभ्यास शामिल हैं. चीन ने भारत में बहुत निवेश किया है और भारत ने भी चीन में बहुत निवेश किया है.’

सरकार को इस प्रक्रिया के प्रति और संबंधों के लिए एक स्थायी ढांचा बनाने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध बताते हुए मुखर्जी ने कहा कि उनका दृढ़ता के साथ यह मानना है कि यदि भारत और चीन को 21वीं सदी में एक महत्वपूर्ण और रचनात्मक भूमिका निभानी है तो उन्हें अपने द्विपक्षीय संबंध को आगे बढ़ाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस बात से सहमत हूं कि हमारे संबंधों में गुणवत्तापूर्ण सुधार के लिए जनता को केंद्र में रखा जाना जरूरी है. इसलिए मेरा सुझाव है कि दोनों देशों के बीच व्यापक स्तर का संपर्क बनाने के लिए दोनों पक्षों को जनता-केंद्रित साझेदारी को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.’

 

राष्ट्रपति ने कहा कि जनता-केंद्रित साझेदारी के लिए दोनों देशों के बीच एक दूसरे के प्रति सम्मान और एक दूसरे के राजनीतिक एवं सामाजिक तंत्र के प्रति अधिक सराहना का भाव होना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘इसे सभी स्तरों पर करीबी संपकरें द्वारा हासिल किया जा सकता है. जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारत ने एक धर्मनिरपेक्ष संसदीय लोकतंत्र होने का विकल्प चुना. हमारी भागीदारी वाली शासन व्यवस्था सहिष्णुता, समावेश और आम सहमति के सिद्धांतों पर आधारित है.’

उन्होंने कहा, ‘आतंकवाद के कृत्यों के जरिए हमारी शांति को भंग करने की कोशिशें हमारे विास को डिगा नहीं पाई हैं. हमारे समाज में लचीलापन है और जनहित की सुरक्षा करने के लिए स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका और एक जीवंत नागरिक समाज है.’

संपकरें को विस्तार देने पर जोर देते हुए मुखर्जी ने कहा कि भारत इस बात से उत्साहित है कि प्रांत से राज्य के संपर्क अब बढ़ रहे हैं और दोनों पक्ष स्थानीय संस्थाओं के बीच आदान-प्रदान को विस्तार देने के लिए काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अंतत: व्यापार और वाणिज्य हमारे रिश्तों में बेहद शक्तिशाली कारक साबित हो सकते हैं, हमें इस बात की खुशी है कि हमारे द्विपक्षीय व्यापार और निवेश में काफी वृद्धि हुई है लेकिन अभी भी ऐसी व्यापक क्षमताएं हैं, जिनका दोहन अब तक नहीं किया जा सका है.

उन्होंने कहा, ‘हम चीनी कंपनियों को ‘मेक इन इंडिया’ पहल में हिस्सा लेने के लिए और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ में हमारे साथ जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं। आइए बिजनेस का एक नया मॉडल तैयार करने के लिए मिलकर नई चीजें खोजें.’

मुखर्जी ने कहा कि इन आठ स्तंभों को ‘जन केंद्रित’ रूख की नींव में रखकर दोनों देश सफलतापूर्वक द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा और मजबूती दे सकते हैं जिससे दोनों देशों की जनता को आपसी लाभ होगा.

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