मुद्राराक्षस के निधन से, खो दिया एक योद्धा

Jun 14, 2016

सभी सत्ताओं को ललकारने और अपने प्रखर विचारों के लिए जाना जाने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार, हमारे अत्यन्त प्रिय साथी मुद्राराक्षस के निधन से लगता है हमने एक ऐसे योद्धा को खो दिया है जिसका होना ही हमारे लिए प्रकाश पुंज की तरह था जिससे हम जैसे लोगों को प्रेरणा मिलती थी.

आज 13 जून को दिन के दो बजकर बयालिस मिनट पर उन्होंने साथ छोड़ दिया. जिन्दगी और मौत के बीच जो जंग चल रही थी, आज उस पर विराम लग गया.

पिछले काफी अरसे से मुद्रा जी की हालत अच्छी नहीं थी. शरीर साथ नहीं दे रहा था. कही आ व जा नहीं पा रहे थे. उनके रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ सी जाती. रक्तचाप भी सामान्य नहीं रहता. अर्थात मौत दरवाजे पर लगातार दस्तक दे रही थी. पर मुद्रा जी उससे हार मानने को तैयार नहीं दिखते. दो-दो हाथ करने व उसे पटकनी देने के मूड में रहते. और इसमें सफल भी हो जाते. पिछले महीने मई की बात है. मौत जिद कर बैठी थी. बलरामपुर अस्पताल के डाक्टरों ने जवाब दे दिया. उन्हें मेंडिकल कॉलेज लाया गया. लगा मुद्रा जी बचने वाले नहीं.

मुद्रा जी की हालत बहुत खराब हो गयी थी. वे अचेत थे. मेडिकल उपकरणों ने उन्हें कैद कर रखा था. उनसे कुछ भी नहीं लिया जा रहा था. कमजोरी शरीर पर हावी थी. लगा इस बार मौत परास्त करके ही मानेगी. पर दूसरे दिन से मुद्रा जी चैतन्य होने लगे और चार दिनों के अन्दर घर आ गये. लेकिन आज तो वे मेडिकल कॉलेज भी नहीं पहुंच पाये. रास्ते मे ही..

मुद्रा जी की इस महीने की 21 तारीख को 83 वां जन्मदिन था. पर एक सप्ताह पहले ही उन्होंने विदा ले लिया. उनका जन्म लखनऊ के पास बेहटा गांव में 21 जून 1933 को हुआ. उनका मूल नाम सुभाष चन्द्र वर्मा था. लखनऊ  विविद्यालय से उन्होंने एम ए किया. छात्र जीवन से ही वामपंथी आंदोलन व साहित्य व संस्कृति से जुड़ गये.

 

1955 से 1976 तक वे कोलकता व दिल्ली में ‘ज्ञानोदय’ व ‘अणुवत’ जैसी पत्रिका में काम किया. बाद में वे आकाशवाणी, दिल्ली में नौकरी की. वहां उन्होंने पहला मजदूर संगठन बनाया. इस दौरान प्रसारण संस्थान में कलाकारों, लिपिकों, चतुर्थ श्रेणी व तकनीकी कर्मचारियों की मांगों को लेकर आंदोलन चलाया. इमरजेन्सी के दौरान उनके ये काम उनकी साहसिकता का परिचायक है. 1976 में वे लखनऊ आ गये और तब से यह शहर ही उनकी कर्म भूमि बन गया. यहां के सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक आंदोलनों के केन्द्र में रहे.

मुद्राराक्षस ने 50 के आसपास से लिखना शुरू किया था. कहानी, उपन्यास, कविता,आलोचना, पत्रकारिता, संपादन, नाट्य लेखन, मंचन, निर्देशन जैसी विधाओं में सृजन किया. दलित व साम्प्रदायिकता जैसे जवलन्त सवालों पर चर्चित व विचारोत्तेजक लेखन किया. धर्म ग्रन्थों की मीमांसा के साथ शहीद भगत सिंह के जीवन पर उन्होंने अदभुत रचनाएं की. चित्रकला, मूर्तिकला एवं संगीत में उनकी सक्रिय रुचि थी. अनेक नाटकों, वृतचित्रों का निर्माण और निर्देशन उन्होंने किया.

आला अफसर, शान्तिभंग, हम सब मंसाराम, तेन्दुआ, तिलचट्टा, मरजीवा, कालातीत, दण्डविधान, नारकीय, हस्तक्षेप जैसी अनगिनत कृतियों की उन्होंने रचना की है. इनके केन्द्र में युद्धरत आदमी है जिसके अन्दर बदलाव की उत्कट आकांक्षा है. दुबले पतले और छोटी कद काठी वाले मुद्रा जी के अन्दर जिस आग और ताकत का हम अनुभव करते, वह इसी आदमी की है. इस जांबाज योद्धा सर्जक के पास जबरदस्त मेधा और मजबूत कलेजा था जो ‘दांत या नाखून या पत्थर’ और ‘मुठभेड़‘ जैसी कहानियों का सृजन ही नही करता बल्कि सत्ता और समय से मुठभेड़ भी करता है.

भारतीय सत्ता के जितने भी मॉडल हैं, नेहरू से लेकर मोदी तक, मुद्रा जी ने इसका क्रिटिक रचा. जिन पल्रोभनों के पीछे आज साहित्यकार अपनी जीभ लपलपाते हैं, मुद्रा जी ने उन्हें ठेंगा दिखायां. उन्होंने पुरस्कारों की परवाह नहीं की और हमेशा मुक्तिबोध के शब्दों में ‘सत्य के साथ सत्ता का युद्ध’ में वे सत्य के लिए जनता के पक्ष में अडिग रहे. उन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी सम्मान, शूद्र महासभा द्वारा शूद्राचार्य तथा अम्बेडकर महासभा द्वारा दलित रत्न सम्मान प्रदान किया गया. मुद्रा जी ने कलम को बुलेट की तरह इस्तेमाल किया.

वे अक्सरहां कहते कि यह ऐतिहासिक पाप होगा, अगर हम चुप रहे. बदलाव का इतिहास रचने के लिए लड़ाई में उतरना जरूरी है. हमें इसलिए लिखना है ताकि जो लड़ रहे हैं, उनका भरोसा न टूटे. सामाजिक बदलाव की जो लड़ाई है, मुद्रा जी इसके विशिष्ट रचनाकार रहे, कलम के योद्धा. उनका लेखन और संस्कृति कर्म शोषितों, दलितों, वंचितों के पक्ष में प्रतिबद्धता और सृजनात्मक संघर्ष का अप्रतिम उदाहरण है. उनकी वैचारिकी इसी संघर्ष से निर्मित हुई है. यह बदलाव की लड़ाई एक बेहतर समाज व्यवस्था की लड़ाई है. अपनी बेबाक राय के लिए वे मशहूर रहे.

कई बार वे प्रगतिशीलता के पारम्परिक चिन्तन से टकराते हुए दिखते हैं. प्रेमचंद की आलोचना करते हुए उन्हें हम पाते हैं. इस प्रक्रिया में वे जो नया ग-सजय़ते हैं, हमारी उनसे असहमति हो सकती है लेकिन इस वैचारिकी से निसन्देह प्रगतिशील चिन्तन के क्षितिज को नया विस्तार मिला. अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से मृद्राराक्षस जन प्रतिपक्ष के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो हमारे लिए न सिर्फ महत्वपूर्ण थे बल्कि जरूरी भी. हम सभी उन्हें बेहद प्यार करते और उससे भी ज्यादा उनकाेह हमें मिलता. दुर्विजय गंज की वह गली जहां मुद्रा जी का निवास है, बीते एक साल से हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी.

याद आता है उनका वह कामरेडाना अन्दाज कि हम जब भी उनके घर पहुंचते वे आगे ब-सजय़कर अभिवादन करते, पूरे जोश से हाथ मिलाते. उस वक्त उनके चेहरे पर गजब का उत्साह, अदभुत चमक देखी जा सकती. विदा करते समय का साथीपन की भरपूर उष्मा से भरा भाव तथो उनका गेट तक आना और प्यार से लबरेज बंधी मुट्ठी के साथ दहिना हाथ उठाना तो भूलता ही नहीं.

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