असम में कमल का खिलना, PM मोदी का जादू बरकरार

May 20, 2016

पूर्वोत्तर के असम में कमल का खिलना वाकई भाजपा के लिए सुकून देने वाला है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्मा बरकरार है.

मोदी सरकार के दो साल पूरे होने के बाद हुए राज्यों के चुनाव में भाजपा को कांग्रेस के गढ़ असम- जैसे राज्य में आश्चर्यजनक सफलता मिली, वहीं वामपंथ के गढ़ केरल में खाता खुलना वाकई भारतीय राजनीति में भाजपा के लिए परचम लहराने से कम नहीं.

भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव परिणाम में सबसे ज्यादा सुकून की खबर यह है कि पूर्वोत्तर के राज्य असम में दो तिहाई बहुमत के साथ भाजपा सत्ता में काबिज हो गई. कांग्रेस से यह राज्य छीना जाना एक तरीके से भाजपा के बार-बार यह कहना कि कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ते कदम ही हैं, इसकी पुष्टि करता है.

भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ 126 सदस्यीय असम विधानसभा में दो तिहाई सीटें जीतीं. भाजपा को 64 जबकि सहयोगी दलों को 23 सीटें मिलीं. पश्चिम बंगाल में भाजपा ने तीन सीट पर जीत दर्ज कराते हुए अपना जनाधार बढ़ाकर अपनी ताकत का इजाफा किया. 2011 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 4.6 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन इस बार उसे 10.7 प्रतिशत मत मिले. केरल में पिछले चुनाव में छह प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन इस बार सहयोगी दल के साथ 15 प्रतिशत मत मिले हैं.

असम में पिछले 15 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस को जनता ने उखाड़ फेंक दिया, क्योंकि भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन किया और दिल्ली और बिहार की हार से सबक लेते हुए असम में जनजाति से ताल्लुक रखने वाले सर्वानंद सोनेवाल को सीएम प्रोजेक्ट किया. भाजपा ने असम में चुनाव की तैयारियां दिल्ली और बिहार में हुई भारी हार से पहले ही शुरू कर दी थी.

पार्टी ने राज्य में मिशन 84 के तहत काम किया और सहयोगी दलों के साथ भी तालमेल कर नई रणनीति बनाई. स्थानीय चेहरे को महत्व दिया और कांग्रेस से आए नेताओं को भी जोड़कर रखा. भाजपा ने असम गण परिषद और बीपीएफ से समझौता किया. चुनाव से पहले कांग्रेस समेत कई दलों के नेताओं ने भाजपा का दामन थामा.

 

असम में भाजपा को 2011 के विधानसभा चुनाव में 5 सीटें ही मिली थीं, इस दृष्टि से राज्य में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व माना जा रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य की 14 में से 7 सीटें मिली थीं.

भाजपा ने हमेशा की तरह इस बार भी अवैध बांग्लादेशी मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की. भाजपा असम में बांग्लादेशी घुसपैठ को देशभर में मुद्दा बनाती रही है और इस चुनाव में वहां गैर असमी हिंदू मतदाताओं के बीच यह मुद्दा जोर पकड़े हुए था. असम गण परिषद ने एक बार केवल घुसपैठियों के मुद्दे पर राज्य में सरकार बनाई थी. मुस्लिम वोटों के बंटने का लाभ भी भाजपा को मिला और हिंदू वोट बैंक के ध्रुवीकरण का भी फायदा पहुंचा.

पिछली बार अजमल की पार्टी को 18 सीटें मिली थीं, लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में एआईयूडीएफ को नौ सीटें ही मिलीं. भाजपा ने बांग्लादेशी हिंदू शरणाथियों को भी लुभाया कि उनको रहने की जगह मिलेगी और विकास से नए रास्ते में उनको भी जोड़ा जाएगा. मुसलमान घुसपैठियों का डर दिखाकर भाजपा ने आखिर असम में अपना कब्जा जमा ही लिया, लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी का यह करिश्मा ही है कि पूर्वोत्तर के लिए अब भाजपा अछूत नहीं रही.

भाजपा में नरेन्द्र मोदी के लिए यह सकून देनेवाला है, वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह राहत देने वाला है, क्योंकि दिल्ली और बिहार के बाद उनकी रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे थे. असम ने पार्टी को नई ऊर्जा दी है, क्योंकि अब यूपी का चुनाव नजदीक आ रहा है.

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