सिर्फ अपना भला करते हैं, पाखंडी हैं भारत के अमीर: फ्रेंच अर्थशास्त्री

Jun 07, 2016

नई दिल्ली। फ्रेंच इकॉनमिस्ट तोमा पिकेती पिछले सप्ताह टाइम्स लिटफेस्ट में शामिल होने मुंबई आए थे। उन्होंने इस समारोह में इंडिया एज ए वैस्टली अनईक्वल सोसायटी के विषय पर अपने विचार व्यक्त किए थे। न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक इसके से पिकेती ने कहा कि उन्हें भारत के एलीट पाखंडी लगते हैं क्योंकि असामनता खत्म करने के लिए वे अपनी सरकार से आर्थिक विकास, मसलन बुनियादी ढांचा तैयार करने या चुनिंदा उ्दयोगों की मदद करने आदि, में संसाधन झोंकने की अपील करते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के इस संवाददाता के मुताबिक, पिकेती कहते हैं कि एलीट क्लास की सरकार से यह अपील और कुछ नहीं बल्कि घुमा-फिराकर खुद की सेवा करवाना है जिससे सिर्फ और सिर्फ अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती है।

उनकी राय में सरकार को प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे समाज कल्याण पर खर्च करना चाहिए। पिकेती ने इस राय के समर्थन में कहा, वर्ल्ड वॉर्स से पहले फ्रांस के एलीट वही कहा करते थे जो आज भारत के एलीट कह रहे हैं कि विकास के बढऩे से असमानता घटेगी। लेकिन, विश्व युद्धों के बाद फ्रांसीसी एलीट को यह कहते पाया जाने लगा कि कल्याणकारी कार्यों में सीधा निवेश ही सही रास्ता है।

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अपनी हालिया मशहूर किताब कैपिटल इन ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी में पिकेती ने कहा है कि बढ़ती असमानता से निबटने के एक तरीके के रूप में अरबपतियों पर भारी-भरकम टैक्स लगाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि असमानता अर्थव्यवस्था के लिए भी उतना ही नुकसानदायक है जितना कि समाज के लिए। पिकेती ने आगे कहा कि मुझे उम्मीद है कि इंडियन एलीट दूसरे एलीट्स की मूर्खतापूर्ण गलतियों से सीखेंगे, इतिहास से सबक लेंगे। पिकेती ने कहा कि भारत उन चीजों से उबर रहा है जिसे कई लोग एक प्रकार के समाजवाद में भयावह प्रयोग के रूप में देखते हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्मत्य सेन जो कहते हैं वह पहली पंक्ति का समाजवाद नहीं है क्योंकि इसने स्वास्थ्य सेवा और प्राथमिक शिक्षा की अनदेखी की है। भारत के संभ्रांत वर्ग ने इतिहास से कल्याणकारी राÓय के विचार से डरना और उससे घृणा करना सीखा है।

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फ्रांसीसी अर्थशास्त्री ने कहा कि साल 1991 में भारत आर्थिक संकट के निम्नतम स्तर पर पहुंच गया था। तब आईएमएफ से वित्तीय राहत पाने के एवज में उसे वॉशिंगटन निर्देशित मुक्त बाजार व्यवस्था के अनुकूल अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाने की शुरुआत करने को मजबूर होना पड़ा। उसके बाद के सालों में धनी और शिक्षित वर्ग ने सबसे Óयादा फायदा उठाया जबकि गरीबों की तादाद और बढ़ गई है।

पिकेती ने कहा कि हाल के दशकों में समृद्ध होने की वजह से इंडियन एलीट का भरोसा इसी इकनॉमिक मॉडल से जुड़ गया। लेकिन, इस तथ्य को भी व्यापक स्वीकार्यता मिली है कि शिक्षा और स्वास्थ्य में अपर्याप्त निवेश राष्ट्र को पीछे से जकड़ा हुआ है। उन्होंने लेक्चर के दौरान कहा कि भारत भी उसी समस्या के समाधान में जुटा है जिसे अन्य देश निबटाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत बहुत पेचिदे समस्याओं को सुलझाने की कोशिश कर रहा है।

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