जज को नौकरी से धोना पड़ा हाथ, तस्करों को हल्की सजा देने पर

Aug 01, 2016

कानून में निर्धारित तीन साल की न्यूनतम सजा के बजाए तस्करों को मात्र तीन और पांच माह की सजा देने पर एक चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

गुजरात के भुज में सीजेएम रहे आरआर पारेख ने चांदी की तस्करी करने वाले 12 तस्करों को इस तरह सजा सुनाई कि उनके जजमेंट के बाद किसी भी अभियुक्त को जेल नहीं जाना पड़ा. विचाराधीन कैदी के रूप में काटी गई जेल को सजा बताकर सभी को दोबारा जेल जाने से बचा लिया गया.

12 अभियुक्तों में से सात को कानून में निर्धारित न्यूनतम सजा भी नहीं दी गई. कस्टम एक्ट, 1962 की धारा 135 के तहत दोषी पाए जाने पर गुनहगारों को कम से कम तीन साल की सजा का प्रावधान है.

सीजेएम ने पांच दोषियों को तीन साल या उससे अधिक की सजा दी, पर सात को तीन साल से कम के कारावास का दंड दिया. पांच अपराधियों को दो-दो साल की सजा दी गई. एक को तीन माह तथा एक अन्य को पांच माह की सजा दी गई. यह सभी तस्कर इतना ही वक्त जेल में अंडरट्रायल के रूप में गुजार चुके थे.

सीआरपीसी की धारा 428 के तहत विचाराधीन कैदी के रूप काटी गई जेल को सजा की अवधि में समायोजित करने का प्रावधान है. सीजेएम ने इस धारा का भरपूर इस्तेमाल किया. 12 तस्करों में से प्रत्येक को इस तरह सजा दी कि 22 जनवरी, 1997 को दिए गए जजमेंट के बाद किसी को जेल नहीं जाना पड़ा.

दोषी करार दिए जाने के बावजूद सभी खुश होकर अदालत से सीधे अपने घर रवाना हो गए. तस्करी के इस मामले ने उस समय पूरे गुजरात में सनसनी फैला दी थी. तस्करों से चांदी की 275 सिल्ली 1995 में बरामद हुई थी. बरामद चांदी का मूल्य उस समय पांच करोड़ 86 लाख रपए आंका गया था.

सीजेएम के अजीबो-गरीब जजमेंट के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने वर्ष 2000 में विभागीय कार्यवाही शुरू की.31 अगस्त, 2001 को जज को चार्जशीट दी गई. जब सीजेएम से पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. अधिनियम में जब न्यूनतम सजा तय है तो उन्होंने न्यूनतम सजा क्यों नहीं दी. जज के जवाब से हाई कोर्ट भी सन्न रह गया.

जज ने कहा कि सीजेएम के पद पर वह नए थे, लिहाजा उन्हें कानून की जानकारी नहीं थी. हाई कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण पर विश्वास नहीं किया.

हाई कोर्ट ने कहा कि जज पारेख सीजेएम भले ही नए रहे हों, पर जुडीशियल सर्विस में 1981 में ही आ गए थे. 15 साल की सर्विस के बाद उन्हें 1996 में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) पदोन्नत किया गया था.

मई 1996 से जून 1998 तक वह भुज जिले के सीजेएम रहे. हाई कोर्ट के बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ जज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी के फैसले को जबरन रिटायरमेंट में तब्दील कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने सीजेएम की दुस्साहस को मिस्कन्डक्ट माना.

अन्य ख़बरों से लगातार अपडेट रहने के लिए हमारे Facebook पेज को Join करे

लाइक करें:-
कमेंट करें :-
 

संबंधित ख़बरें

वायरल वीडियो

और पढ़ें >>

मनोरंजन

और पढ़ें >>
और पढ़ें >>