अगर जल्लीकट्टू पर केंद्र सरकार अध्यादेश लाई, तोे ‘पेटा’ लेगा कानूनी सहारा

Jan 20, 2017
अगर जल्लीकट्टू पर केंद्र सरकार अध्यादेश लाई, तोे ‘पेटा’ लेगा कानूनी सहारा

पीपुल फॉर इथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया ने 19 जनवरी को कहा कि यदि जल्लीकट्टू को जारी रखने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाती है तो वह कानूनी रास्ता अख्तियार करेंगे। और तमिलनाडु में इस खेल के विरुद्ध लोगों के बीच जागरूकता फैलाया जायेगा। इस संगठन ने यह भी दावा किया कि सांढों की कुछ खास प्रजातियां ‘श्वेत क्रांति’ और ‘संकरण कार्यक्रमों’ के चलते विलुप्त होने के कगार पर है। पेटा के प्रवक्ता मनिलाल वल्लीयाटे ने कहा, ‘हमारा अभियान सभी जानवरों के प्रति क्रूरता के खिलाफ है। और अध्यादेश आने पर हम अपने वकीलों से संपर्क करेंगे और फिर फैसला लेंगे।

उन्होंने कहा, इस देशी नस्ल को बचाने के लिए केवल जल्लीकट्टू एकमात्र तरीका नहीं है। और भी कई दयालु संरक्षण तरीके हैं। तमिलनाडु सरकार ने 1980 के दशक में कई संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए थे। उन्होंने बताया की जल्लीकट्टू 80 के दशक में भी होता था। लेकिन उसकी संख्या में गिरावट श्वेत क्रांति के दौरान संकरण कार्यक्रम के चलते आई। सांढ को काबू में करने से जुड़े इस खेल पर उच्चतम न्यायालय की पाबंदी के विरुद्ध तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजधानी में तेज हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर पेटा प्रवक्ता ने कहा, सभी समर्थक सूचना की गलत व्याख्या के आधार पर विरोध कर रहे हैं।

प्रवक्ता ने कहा कि मैं सभी नेताओं से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले भारतीय संविधान को देखे। मैं उनसे तथ्यों को परख लेने और उच्चतम न्यायालय के फैसले को पढ़ लेने का अनुरोध करता हूं। भाषा की खबर के अनुसार, उन्होंने कहा कि सांढ ‘शिकार’ श्रेणी में आते हैं और यदि उन्हें सड़क पर यू ही छोड़ दिया जाए तो वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। प्रवक्ता ने कहा, ‘वे केवल तभी लड़ाई या उछलने पर उतर आते हैं जब उन्हें उत्तेजित किया जाता है। जल्लीकट्टू में क्रूरता निहित है और आपको बस शिकार पशु को दौड़ने के लिए उकसाया जाता है या भयावह स्थिति पर प्रतिक्रिया दिलवाया जाता है।

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