अपने मुल्क से मुहब्बत और सेना की इज्जत करना सिखाता है इस्लाम: राजीव शर्मा

Apr 25, 2017
अपने मुल्क से मुहब्बत और सेना की इज्जत करना सिखाता है इस्लाम: राजीव शर्मा

इन दिनों कश्मीर फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया में दो वीडियो अब तक लाखों लोग देख चुके हैं। पहले वीडियो में सीआरपीएफ के एक जवान के साथ कोई स्थानीय युवक बदसलूकी कर रहा है। दूसरे वीडियो में सेना की जीप पर किसी युवक को आगे बैठाकर बांध रखा है। इन दोनों ही वीडियो को लेकर पक्ष-विपक्ष में काफी कमेंट्स किए जा रहे हैं। मैं उनका जिक्र नहीं करूंगा।

इस संबंध में मेरा स्पष्ट मत है, अपने देश की सेना पर गर्व किया जाता है, उस पर पत्थर नहीं फेंके जाते। जहां तक इस्लाम धर्म की बात है, ये पत्थर फेंकने वाले जानते ही नहीं कि हजरत मुहम्मद (सल्ल.) और महान खलीफाओं ने देशप्रेम तथा सेना के लिए क्या हुक्म दिया है। अगर ये एक बार ठीक-ठीक समझ लें, तो इनकी आंखें खुल जाएं। मुल्क की मिट्टी से मुहब्बत करने की शिक्षा देने वाले हजरत मुहम्मद (सल्ल.) थे।

जहां तक इस युवक को जीप के आगे बांधने का सवाल है, मैं इसे पूरी तरह अनुचित कहूंगा। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए। इससे लोगों का सेना पर भरोसा कमजोर होता है।

मेरा आपसे एक सवाल है, खासकर सभी मुस्लिम मित्रों से है। जवान से बदसलूकी का वीडियो देखकर कई नासमझ लोग कुरआन और नबी (सल्ल.) की शिक्षाओं पर सवाल उठा रहे हैं। एक गलतफहमी हजार नफरतों को जन्म दे रही है। फिर आप खामोश क्यों हैं?

मुझे अफसोस है कि दिनभर सोशल मीडिया में नेताओं की निंदा तथा जय-जयकार में वक्त बर्बाद करते मेरे मित्रों में से एक ने भी जमाने को यह नहीं बताया कि कुरआन, हजरत मुहम्मद (सल्ल.) और महान खलीफाओं ने देशप्रेम तथा सेना के सम्मान में क्या-क्या कहा है।

जब तक आप पढ़ेंगे नहीं, लोगों को अच्छी बातें बताएंगे नहीं, सांप्रदायिक ताकतें हमारी गलत तस्वीर पेश करती रहेंगी। पीछे से हम दोष देते रहें कि ये यहूद की चाल है, अमरीका की साजिश है, मीडिया बदनाम कर रहा है। असल मसला ये है कि मौके पर हम खुद कितनी पहल करते हैं।

मैं यहां आप सबके लिए मेरी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूं। कृपया इसे खुद पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएं। खासकर उन मित्रों को जिन्हें गलतफहमी है कि कश्मीर में लोगों को सेना पर पत्थरबाजी की प्रेरणा इस्लाम से मिलती है।

मुझे पैदल चलना बहुत पसंद है। अगर कहीं पहुंचने के लिए समय की बंदिश न हो और दूरी बहुत ज्यादा न हो तो मैं पैदल ही जाना पसंद करता हूं। जब मेरी उम्र करीब दस साल थी, मैं नवलगढ़ शहर स्थित मेरे स्कूल से पैदल चलकर कई बार गांव आ चुका हूं। स्कूल से मेरे घर की दूरी करीब 14 किमी थी।

इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। एक बार मैं और मेरा एक मित्र स्कूल की छुट्टी के बाद बस स्टाॅप पर खड़े थे। वहां एक वृद्ध महिला भीख मांग रही थी। मैंने किराए में से एक रुपया उसे दे दिया। वह दुआएं देती चली गई।

उसके बाद मैंने जेब टटोली, मेरे पास उतना किराया नहीं बचा था कि गांव पहुंच सकूं। मैंने मित्र को यह बात कही। फिर हम दोनों ने फैसला किया कि बाकी के पैसों से भुने हुए चने खरीदेंगे और उनका लुत्फ उठाते हुए पैदल ही गांव चले जाएंगे। हमने यही किया। उसके बाद तो हम कई बार पैदल चलकर गांव आए। खासतौर से शनिवार को, क्योंकि अगले दिन छुट्टी होती है।

मैंने पैदल चलने का यह जुनून कई लोगों में देखा और पढ़ा है। हम तो बहुत मामूली लोग हैं। यहां महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक देवजी, बुद्ध जैसे महापुरुष भी हुए हैं जो पैदल चले तो पीछे कारवां बन गया। अगर मैं बीते जमाने की बात करूं, खासतौर से हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के जमाने की तो उस दौर में भी ऐसे अनेक महान लोग हुए हैं जिन्होंने मीलों लंबी यात्राएं पैदल चलकर कीं। उनका मकसद भी बहुत महान था।

हजरत अली (रजि.) को तो पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) से इतना प्रेम था कि मदीना के लिए हिजरत की तो पैदल ही चल दिए। तपते-जलते अरब के रेगिस्तान में पैदल सफर करते हुए वे हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से जहां मिले, वहां कुबा मस्जिद बनाई गई।

जब मैं कुबा मस्जिद का नाम पढ़ता-सुनता हूं तो मुझे हजरत मुहम्मद (सल्ल.) और हजरत अली (रजि.) की याद आती है। यहां मैं महान खलीफा हजरत अबू-बक्र (रजि.) के जीवन की एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। उस जमाने में जब देश की रक्षा या शांति कायम करने के लिए सेना रवाना होती तो खलीफा अबू-बक्र (रजि.) सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए उन्हें विदा करने आते।

वृद्धावस्था में जब स्वास्थ्य अच्छा न रहा, तब भी वे सेना का मनोबल बढ़ाने जरूर आते। यहां तक कि उनके साथ दूर तक पैदल चलते। खलीफा के सम्मान में कोई घुड़सवार नीचे उतरना चाहता तो वे उसे बहुत विनम्रता से मना कर देते। देश के उन बहादुर सैनिकों के सम्मान में पैदल चलने पर उनका कहना था- इसमें क्या बात है अगर मैं थोड़ी दूर तक चलकर अल्लाह की राह में अपने पैर धूल में भर लूं। अल्लाह ऐसे लोगों पर जहन्नुम की आग हराम कर देता है।

उस महान खलीफा की नजर में देशप्रेम का स्थान इतना ऊंचा था कि उन्होंने सैनिकों के रास्ते की धूल को भी जहन्नुम की आग से ज्यादा ताकतवर बताया।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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