इशरत जहां मुद्दे पर: मोदी के खिलाफ साजिश: मीनाक्षी

Mar 06, 2016

इशरत जहां मुद्दे पर चल रहे आरोप-प्रत्यारोपों के बीच भाजपा की वरिष्ठ नेता और सांसद मीनाक्षी लेखी ने इस मामले में ‘साजिश’ को बेनकाब करने पर जोर दिया.

उन्होंने पिछली यूपीए सरकार पर राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश की सुरक्षा को खतरे में डालने और जान पर खेलने वाले आईबी के जांबाज अधिकारियों को अपमानित करने का आरोप लगाया है.

लेखी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि मुंबई हमले के आरोपी पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली की ओर से इशरत के लश्कर ए तैयबा की सदस्य होने की तस्दीक कर मामले में अंतिम कील ठोक देने के बाद अब यह सवाल उठता है कि एक दशक तक नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहरीले दुष्प्रचार को किसने हवा दी.

उन्होंने कहा कि अब इस साजिश से पर्दा उठाने का समय आ गया है. यूपीए सरकार तो इस स्तर तक चली गयी कि उसने इस मामले में शामिल आईबी अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू कर दी. खुफिया अधिकारी रोज अपनी जान जोखिम में डालते हैं और उन्हें अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने तथा किसी राजनीतिक शक्ति को उभरने से रोकने के लिए उसे अपमानित करने से घिनौना कोई काम नहीं हो सकता.

भाजपा नेता ने कहा कि इशरत जहां मामले को जनता की याददाश्त से मिटने नहीं देना चाहिए. यह एक ऐसे उदाहरण के रूप में रहना चाहिए कि कुछ दल अपने राजनीतिक फायदे के लिए किस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने की हद तक गिर सकते हैं. उन्होंने कहा कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ हो रहा है और जिस तरह कुछ दल राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों का साथ दे रहे हैं, यह भी इसी का एक और उदाहरण है.

लेखी ने कहा कि 15 जून 2004 को लश्कर ए तैयबा के चार आतंकवादी इशरत जहां, जावेद शेख, जीशान जौहर और अमजद अली राणा अहमदाबाद के बाहरी इलाके में गुजरात पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे. गुप्तचर ब्यूरो के मुताबिक वे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने आये थे. लेकिन विडंबना है कि भारत के सबसे सफल आंतकवाद निरोधक अभियानों में से एक इस घटना को वाहवाही नहीं मिली बल्कि इस मामले में गुजरात सरकार और उसके अधिकारियों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मोदी विरोधी और भाजपा विरोधी ‘गिरोह’ जिसमें कई राजनीतिक दल, गैर सरकारी संस्थायें, सरकारी मशीनरी और मीडिया का एक वर्ग शामिल है, ने इस अभियान को मोदी और गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह की शह पर हुई फर्जी मुठभेड़ ठहराने के लिए जबर्दस्त दुष्प्रचार किया. लेकिन मोदी और शाह को फंसाने की कांग्रेस नीत यूपीए की चालें नाकाम रहीं. यहां तक कि हेडली की 2010 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के समक्ष दी गयी इस गवाही को भी दबाने का प्रयास किया गया कि इशरत जहां लश्कर की सदस्य थी. खुफिया अधिकारियों को सीबीआई जांच का डर भी दिखाया गया लेकिन यूपीए सरकार के सारे पैंतरे बेकार गए.

भाजपा नेता ने कहा कि वैसे तो कोई इस बात पर भी गंभीर सवाल उठा सकता है कि इशरत जहां मामले में न्यायमूर्ति अभिलाषा सिंह को गुजरात उच्च न्यायालय में क्यों नियुक्ति किया गया. वह कांग्रेस के दिग्गज नेता और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पुत्री हैं. अगर यह कहा जाये कि यूपीए ने किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्हें नियुक्त किया था तो गलत नहीं होगा.

लेखी ने कहा कि आईबी के इस अभियान की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पुंछ से अपनी गतिविधियां चला रहे लश्कर के सदस्य एहसान इलाही को मारा. उसके शव से मिले पत्रों के आधार पर अधिकारी अहमदाबाद के एक वकील तक पहुंचे. वहां से फिर अभियान आगे बढ़ा.

उन्होंने कहा कि इस बात को मानने के कई वैध कारण हैं कि आईबी लश्कर की साजिश का पर्दाफाश करने में कामयाब हो गयी थी और उसके पास इस बात की पुख्ता जानकारी थी कि आतंकवादी कब और कहां हमला करेंगे. मुठभेड़ के बाद अहमदाबाद पुलिस की अपराध शाखा द्वारा दाखिल प्राथमिकी में कहा गया था कि अधिकारी जानते थे कि संदिग्ध नीले रंग की टाटा इंडिका में आ रहे हैं जिसका नंबर एमएच02जेए4786 है.

भाजपा नेता ने कहा कि क्या यह मानना ठीक नहीं होगा कि आईबी निदेशक, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, केंद्रीय गृह मंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री जानते थे कि मोदी को खतरा है. अगर ऐसा है तो फिर क्या इस बात पर यह सवाल उठना वाजिब नहीं है कि आतंकवादियों को गुजरात से महाराष्ट्र क्यों जाने दिया गया. उन्हें महाराष्ट्र में ठिकाने क्यों नहीं लगाया गया.

उन्होंने कहा कि अब यह स्पष्ट है कि इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में नहीं मारी गयी थी जबकि 2014 के चुनावों में मिली करारी हार से अभी तक उबर नहीं पाये लोग एक दशक से भी अधिक समय तक फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाते रहे. इस मामले की जांच करने वाले विशेष जांच दल को फर्जी मुठभेड़ के आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला.

 

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