इशरत जहां मामला : गृह मंत्रालय की जांच कमेटी से सियासी माहौल गर्म

Mar 15, 2016

बहुचर्चित इशरत जहां मुठभेड़ कांड की जांच पर कमेटी बैठाकर गृह मंत्रालय ने सियासी माहौल एक बार फिर गर्म कर दिया है.

कमेटी की जांच रिपोर्ट का परिणाम क्या होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन इस कमेटी के गठन ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की कुछ समय के लिए बोलती बंद कर दी है.

फाइल से जो दस्तावेज गायब हुए हैं वह काम के हैं या नहीं, दस्तावेज क्या थे, इस मामले में मंत्रालय के पास भी स्पष्ट तस्वीर नहीं है. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इशरत जहां से संबंधित फाइलों के गायब होने के मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित की है.

दूसरे हलफनामे में तथ्य कमजोर किए गए : इशरत समेत चार लोग 15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे. राजनाथ के मुताबिक इस मामले में केंद्र सरकार ने पहले हलफनामे में इशरत को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की सदस्य बताया गया था, लेकिन दूसरे हलफनामे में इस तथ्य को कमजोर करने की कोशिश की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि यह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को फंसाने की साजिश थी.

गायब पन्ने कितने काम के : आतंकी डेविड हेडली ने भी कहा है कि इशरत लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी थी. गृह मंत्रालय सूत्र बताते हैं कि सवाल यह उठता है कि जो दस्तावेज यानी फाइल से पन्ने गायब हुए हैं वह काम के थे या नहीं. हालांकि, इसपर ध्यान देने की बजाय दस्तावेज गायब होने की बात करके सियासी माहौल गर्म किया जा रहा है.

मंत्रालय के कई अधिकारी कहते हैं कि वैसे नियम यह है कि जब कोई ड्राफ्ट तैयार होता है और उसमें कुछ काट-छांट होती है तो फाइनल ड्राफ्ट को फाइलों में लगाकर नोटिंग की जाती है और काट-छांट वाली ड्राफ्ट कापी को फाड़ देते हैं. मंत्रालय सूत्रों के अनुसार, वे दस्तावेज (ड्राफ्ट कापी) कहां हैं, किस टेबल पर फाइल से वे पन्ने गायब हुए हैं, का पता लगाना टेढ़ी खीर है, क्योंकि मामला काफी पुराना है. कुछ दिन पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने कहा था कि उन्होंने दो पत्र  सॉलीसिटर जनरल को लिखे थे. बहरहाल जो हो जांच कमेटी बैठाकर गृह मंत्रालय ने पूर्ववर्ती सप्रंग सरकार की बोलती बंद कर दी है.

 

साजिश की बू मिली थी सीबीआई को इशरत मामले में सीबीआई ने अपने रडार पर कुछ आईबी अधिकारियों को रखा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि उन्होंने मनमाफिक हलफनामा गृह मंत्रालय के अधिकारी को दबाव में डालकर 2009 में गुजरात उच्च न्यायालय में डलवाया था. सीबीआई आईबी के कुछ और अधिकारियों को इशरत के अलावा सादिक जमाल के मामले में भी स्कैनर पर रखा है. सूत्रों के अनुसार, इशरत मामले में गृह मंत्रालय द्वारा 2009 में दाखिल किया गया हलफनामा भी सीबीआई जांच के दौरान संवेदनशील हो गया था.

सीबीआई ने जब पहले और दूसरे हलफनामे की जांच की तो उसको इसमें साजिश की बू आ रही थी. पहला हलफनामा आईबी के एक आला अधिकारी के कहने पर किया गया था, जो सीबीआई के स्कैनर पर हैं. सीबीआई को लगता है कि उन्होंने खुद यह हलफनामा लिखवाया था. गृह मंत्रालय ने पहला हलफनामा 6 अगस्त, 2009 को गुजरात हाईकोर्ट में दिया था. उसमें इशरत और तीन मृतकों को लश्कर-ए-तैयबा से संबंधित बताते हुए मुठभेड़ को सही ठहराया गया था. इसके बाद गृह मंत्रालय ने सितम्बर, 2009 को दूसरा हलफनामा दाखिल किया. उसमें कहा गया कि इशरत, जो एक आतंकवादी है, को लेकर पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

सूत्रों के अनुसार, सीबीआई को ऐसी आशंका थी कि पहला हलफनामा इशरत मुठभेड़ मामले में षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है. इशरत और उसके साथी जावेद शेख, अमजद अली राणा और इशान जौहर जिसको 15 जून, 2004 को अहमदाबाद के बाहर एक मुठभेड़ में मार गिराया गया था. गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आरबीएस मणि ने खुलासा किया है कि मामला संवेदनशील था. मणि ने अपने बयान में कहा कि आईबी के अधिकारियों ने जो सूचनाएं दी थीं, वह पहले हलफनामे में थीं. उस समय खुफिया विभाग के दो अधिकारी उनके सामने थे और एक ड्राफ्ट हलफनामा लेकर आए थे, जिसे गृह मंत्रालय के सुपरवाइजरी अधिकारी ने अंतिम रूप दिया था.

इस तरह मेरी भूमिका इस हलफनामे में बहुत सीमित थी. मैं अहमदाबाद अगस्त, 2009 को आया और दिए गए हलफनामे को दायर कर दिया.’ सीबीआई ने मणि को इशरत मामले में सरकारी गवाह बनाया था. मणि ने अपने बयान में यह भी कहा है कि जो ड्राफ्ट हलफनामा खुफिया विभाग के अधिकारी लेकर आए थे, उस समय गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा के निदेशक भी थे, जिन्होंने केबिन में अंतिम रूप दिया. मणि ने यह भी कहा कि उस समय खुफिया विभाग के दो अधिकारी भी मौजूद थे, जिनके नाम उन्हें याद नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि गृह मंत्रालय ने जब पहला हलफनामा दाखिल किया, उस समय सरकार को यह पता नहीं था कि अहमदाबाद के उस समय के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग पहले स्द्मो ही जांच कर रहे हैं.

समिति के जिम्मे हैं ये काम

समिति का अध्यक्ष मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव (विदेश विभाग) बीके प्रसाद को बनाया गया है. समिति पता लगाएगी कि इशरत मामले में दूसरे हलफनामे का मसौदा किसने तैयार किया था और वह कैसे गायब हो गया. समिति उन अधिकारियों से पूछताछ करेगी जो इस हलफनामे को बनाने की प्रक्रिया से जुड़े थे. इशरत मामले में तत्कालीन गृह सचिव के अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती को लिखे दो पत्र गायब हैं और तत्कालीन गृह मंत्री द्वारा हलफनामे में किए गए बदलाव की कॉपी भी उपलब्ध नहीं है.

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