स्पेस शटल की दुनिया में भारत ने स्थापित किया नया कीर्तिमान

May 24, 2016

भारत के लिए आज ऐतिहासिक दिन रहा. आज सुबह सात बजे भारत ने स्पेस शटल की दुनिया में नया कीर्तिमान स्थापित किया.

आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से पहला मेड इन इंडिया स्पेस शटल लॉन्च किया गया. ये स्पेस शटल पूर्ण रूपेण भारत निर्मित है और खास बात ये है की ये रियूजबल है. रूस, अमेरिका, जापान के बाद भारत इस क्लब के साथ जुड़ा है, इसलिए  इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) की ये लॉन्चिंग ऐतिहासिक है.

इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से सुबह 7 बजे लॉन्च किया गया.

क्या है इसके फायदे,क्यों है ये खास

स्पेस शटल रियूजेबल लॉन्च व्हीकल-टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (RLV-TD) से लॉन्च हुआ. 6.5 मीटर लंबे प्लेन की तरह दिखने वाले स्पेसक्राफ्ट का वजन 1.75 टन है. इसे एटमॉस्फियर में स्पेशल रॉकेट बूस्टर की मदद से भेजा गया.

ये व्हीकल स्पेस शटल को ऑर्बिट में छोड़कर एक एयरक्राफ्ट की तरह वापस आने लायक बनाया गया है. इसे दोबारा से यूज किया जा सकता है. RLV-TD की ये हाइपरसोनिक टेस्ट फ्लाइट रही. इसकी स्पीड 5 मैक साउंड से 5 गुना ज्यादा  है. शटल को स्थापित कर व्हीकल 180 डिग्री मुड़कर वापस आ जाएगा.

इसके बाद RLV-TD बंगाल की खाड़ी में नेविगेट करा लिया गया. साइंटिस्ट्स का कहना है कि RLV-TD को पानी पर तैरने के लिहाज से डिजाइन नहीं किया गया. इसलिए इसे समंदर के तट से इस रनवे को करीब 500 किमी दूर बनाया गया.

ये पहली बार हुआ कि शटल को लॉन्च करने के बाद व्हीकल बंगाल की खाड़ी में बने वर्चुअल रनवे पर लौटाने का फैसला किया गया. रेयूजबल होने की वजह से स्पेस मिशन की कॉस्ट 10 गुना कम हो जाएगी और साइंटिस्ट्स की मानें तो रियूजेबल टेक्नोलॉजी के यूज से स्पेस में भेजे जाने वाले पेलोड की कीमत 2000 डॉलर/किलो तक कम हो जाएगी.

स्पेस में इस नयी तकनीक के साथ ही अब भारत एलीट क्लब में शामिल हो गया है.

अभी तक ऐसे रियूजेबल स्पेस शटल बनाने वालों के क्लब में अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान ही हैं. चीन ने अब तक इस स्पेस शटल की कोशिश तक नहीं की है. रूस ने 1989 में ऐसा ही स्पेस शटल बनाया जरूर था लेकिन इसने सिर्फ एक बार ही उड़ान भरी.

अमेरिका ने पहला आरएलवी टीडी शटल 135 बार उड़ाया जो 2011 में यह खराब हो गया. एसयूवी जैसा दिखने वाला यह स्पेस शटल अपने ओरिजिनल फॉर्मेट से छह गुना छोटा है. हालाँकि ये परिक्षण है माना जा रहा है कि टेस्ट के बाद इसको पूरी तरह से तैयार करने में 10 से 15 साल लग जाएंगे.

खबरों के मुताबिक अगर सब ठीक-ठाक रहा और फिनक वर्जन भी सक्सेसफुली लांच हुआ तो स्पेस शटल का नाम ‘कलामयान’ रखा जाएगा.

 अन्य ख़बरों से लगातार अपडेट रहने के लिए हमारे Facebook पेज को Join करे

 

लाइक करें:-
कमेंट करें :-
 

संबंधित ख़बरें

वायरल वीडियो

और पढ़ें >>

मनोरंजन

और पढ़ें >>
और पढ़ें >>