आइए प्रकाश डालते है आखिर क्यों, मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने AI से खरीदवाए 50 हजार करोड़ के जहाज

May 10, 2016

नई दिल्लीः सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया 38 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में गले तक डूबी थी मगर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को इसकी परवाह नहीं रही। खरीदे जाने थे 28 विमान मगर मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने दबाव डाल 2006 में खरीदवा दिए 68 विमान। पैसे नहीं रहे तो एयरइंडिया को मोटे ब्याज पर लोन लेकर जहाज खरीदने पड़े। क्योंकि मंत्री का हुक्म जो था। यह हाल तब रहा जबकि कंपनी घाटे में थी, सिर पर कर्ज भारी-भरकम कर्ज लदा था । मंत्री प्रफुल्ल पटेल के 50 हजार करोड़ रुपये के अनावश्यक सौदेबाजी के फैसले ने देश की इस विमानन कंपनी की कमर ही तोड़ दी। मंत्री के इशारे पर पूर्व में तय विमान सौदे की फाइल में विमानों की संख्या 28 से बढ़ाकर 68 कर दी गई। कैग ने 2011 में कर्ज और घाटे में डूबकर बर्बादी के मोड़ पर खड़ी कंपनी में इस भारी सौदे को लेकर उड्डयन मंत्रालय की खिंचाई की तो एक्शन लेने के बाद यूपीए सरकार ने रिपोर्ट कूड़े में फेंक दी। वजह कि मंत्री अपना था, सौदेबाजी में सरकार शामिल रही।
जी हां, देश में फिलवक्त अगस्ता वेस्टलेंड हेलीकाप्टर घोटाले को लेकर भले ही तूफान मचा हो मगर इंडिया संवाद ने एक और विमान सौदे में हुए भारी घोटाले से पर्दा हटाने की कोशिश की है। छानबीन में कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। पढ़ें कैसे जिम्मेदारों की गलत नीतियों से सरकारी विमानन कंपनी घाटे की राह पर चल पड़ी का पार्ट-1।

क्या है 50 हजार करोड़ के विमानों की सौदेबाजी का मामला
दरअसल मई 2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद प्रफुल्ल कुमार पटेल के हाथ नागरिक उड्डयन मंत्रालय की कमान आई। उन्होंने दो अगस्त 2004 को मंत्रालय व एयरइंडिया अफसरों की मीटिंग बुलाई थी। मंत्री ने यात्रियों की बढ़ती संख्या का हवाला देते हुए एयरइंडिया के फ्लीट का विस्तार करने की बात कही। अफसरों को 28 की जगह 68 प्लेन का आर्डर बनाने को कहा। इसमें दो दर्जन से अधिक बोइंग विमान थे। आंकलन के मुताबिक मंत्री के कहने पर अधिक विमानों की खरीद से एयर इंडिया पर 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बोझ पड़ा। अहम सवाल रहा कि मंत्री पटेल ने यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि गले तक कर्ज में डूबी यह कंपनी कहां से पैसा लाएगी और किन रूटों पर विमान दौड़ाएगी। सूत्रों के मुताबिक मंत्री ने इंडियन एयरलाइंस पर भी 43 विमान खरीदने के लिए दबाव डाला मगर अफसरों ने इसे ठुकरा दिया। सूत्रों के मुताबिक नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तत्कालीन अंडर सेक्रेटरी केके पद्मनाभन ने 5 अगस्त 2004 को एयरलाइंस के सीएमडी वी तुलसीदास को एक पत्र भेजकर दो अगस्त की मंत्री के साथ हुई मीटिंग के मिनिट्स भेजे। कहा कि मंत्नी जी चाहते हैं कि एयरलाइंस भी विमान की फ्लीट बढ़ाए। लिहाजा सरकार को भेजी जाने वाली फाइल में इस अतिरिक्त विमानों की संख्या जोड़ दी जाए। सूत्र बताते हैं की एयरलाइंस के तत्कालीन सीएमडी तुलसीदास इस पर सहमत भी हुए मगर मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव बी सुब्रमण्यम ने नाराजगी जताई। उन्होंने कंपनी की माली हालत के मद्देनजर इस फैसले को गलत ठहराया। उधर मंत्री प्रफुल्ल पटेल के फैसले से एयर इंडिया की मुश्किलें बढ़ गईं। क्योंकि वह 38 हजार करोड़ रुपये के कर्ज और सात हजार करोड़ रुपये के घाटे में पहले से डूबी हुई थी। ऊपर से बगैर जरूरत के 28 की जगह 40 और विमानों की खरीद से 50 हजार करोड़ का भारीभरकम चपत लग गई। आखिर विमानों की संख्या सिर्फ अपने स्तर से बढ़ाने के पीछे क्या मंत्री प्रफुल्ल पटेल कमीशन के जरिए निजी लाभ अर्जित करना चाहते थे या फिर सचमुच में वे एयरइंडिया को मार्केट के हिसाब से तैयार करना चाहते थे। अगर पटेल एयरइंडिया के फ्लीट को दूसरी कंपनियों से मुकाबला करने के लिए तैयार करना चाहते थे तो अहम सवाल है कि जनवरी से अगस्त 2004 के बीच न यात्रियों की संख्या में इजाफा हुआ था न ही ट्रैफिक ग्रोथ में। फिर महंगे विमानों को खरीदने का निर्णय कैसे लिया गया। वो भी कंपनी को कर्ज लेकर विमान खरीदवाया गय।
एनडीए सरकार के प्रस्ताव में यूपीए राज में यूं हुआ बदलाव
एनडीए सरकार ने 28 हवाई जहाज खरीदने का प्नस्ताव तैयार किया था। यूपीए सरकार में मंत्री पटेल ने जो नया पूरक प्रस्ताव तैयार कराया।वह यूं था। फाइनल आर्डर के मुताबिक 28 की जगह 68 विमानों को खरीद की हरी झंडी दे दी गई। जिसमें बोइंग 77 एलआर(लांग रेंज, बोइंग777 ईआर(एक्स्ट्रा रेंज), बोइंग 787 ड्रीमलाइनर शामिल हुए। अंतिम आर्डर में 50 चौड़े आकार के विमान और 18 संकरे आकार के विमान सौदा तय हुआ। 18 बोइंग 736-700 विमानों की खरीद के पूर्व में हुए निर्णय में कोई तब्दीली नहीं हुई।
कुर्सी संभालने के चंद महीने में प्रफुल्ल ने कराई डील
कैग की रिपोर्ट के बाद सबसे बडा सवाल यह रहा कि जब 28 विमान को खरीदने में पूर्ववर्ती सरकारों ने 1996 से 2004 के बीच आठ साल लगा दिए, फिर प्रफुल्ल पटेल ने यूपीए सरकार में मंत्री की कुर्सी संभालने के चंद महीने में ही कैसे 68 विमानों को खरीदने की डील पक्की कर दी। इस जल्दबाजी से क्या फायदा लेने की कोशिश हुई। कैग के इस कमेंट से गंभीर वित्तीय अनियमतिताओं की तरफ इशारा होता है। विमान सौदेबाजी से जुडा़ एक और अहम सवाल है कि जब किसी कंपनी का सालाना टर्नओवर महज सात हजार करोड़ रुपये का हो तो फिर 50 हजार करोड़ रुपये का सौदा करने का क्या तुक। कैग की इस रिपोर्ट के बाद इंडियन कामर्शियल पायलट एसोसिएशन भी सीबीआइ जांच की मांग कर चुका है मगर मामला डंप चल रहा।

प्लेन खरीद में नहीं रही पारदर्शिता

कैग ने 2011 की रिपोर्ट में विमान खरीद के लिए बेंचमार्क स्थापित न करने पर उड्डयन मंत्रालय की खिंचाई की। रिपोर्ट में कहा गया कि मंत्रालय ने यात्रियों की संख्या बढ़ने के मद्देनजर फ्लीट बढ़ाकर राजस्व बढ़ने का प्रस्ताव तैयार किया मगर यह नाटकीय रहा।
उधर कैग रिपोर्ट पर प्रफुल्ल पटेल ने वजाब में कहा कि एनडीए राज में एयइंडिया के बेड़े में 20 साल पुराने 93 विमान रहे। जिससे एयरइंडिया अन्य विमानन कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा था। इस नाते नए विमान खरीदे गए। हालांकि पटेल ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि विमानों की खरीद के फैसले में अनुचित जल्दबाजी दिखाई गई। उधर एनडीए सरकार में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री रहे राजीव प्रताप रूड़ी ने यूपीए सरकार में विमान सौदे में 80 हजार करोड़ रुपये घोटाले की सीबीआइ जांच की मांग करते हैं।

सीएजी ने और क्या कहा
सीएजी ने घाटे के नाजुक दौर में विमानों की भारी-भरकम खरीद को उसकी माली हालत के मद्देनजर आपदा करार दिया।
कर्ज लेकर विमानों की जरूरत से ज्यादा खरीद पर मंत्रालय की खिंचाई की गई
2002 से लेकर 2010 के बीच की अवधि में नागरिक उड्डयन मंत्रालय में हुई ज्यादातर अनियमितताएं प्रफुल्ल पटेल के कार्यकाल से जुडीं रहीं। जिस पर उनकी भूमिका पर सवाल उठाए गए।

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