सभ्य समाज पर भारी, मीडिया की गैर जिम्मेदारी

Aug 16, 2016

हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा की शुरुआत 1991 में एक संकल्प के साथ स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को हुई थी.

हिन्दी क्षेत्र के कई राज्यों के, कई प्रमुख शहरों से इसका प्रकाशन हुआ और यह व्यापक पहुंच वाला एक बहुसंस्करणीय अखबार बन गया. इसके साथ ही सहारा इंडिया परिवार के उर्दू, अंग्रेजी प्रकाशन शुरू हुए और कुछ समय के उपरांत ही राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय समाचार चैनलों की भी शुरुआत हुई. देखते ही देखते सहारा इंडिया परिवार का मीडिया उद्यम देश का एक खास मीडिया उद्यम बन गया.

राष्ट्रीय सहारा ने अल्पावधि में ही लोकप्रियता प्राप्त की तो इसका कारण इसका संकल्प था. संकल्प यह था कि हम इसे एक व्यावसायिक उद्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति का उद्यम बनाएंगे. राष्ट्रीयता को अपना धर्म मानेंगे और समूचे भारत को अपना परिवार. हम मानवीय आदर्शों से संचालित होंगे और सच्चाई को अपने कर्तव्यों का आधार बनाएंगे. हमने संकल्प लिया था कि देश और समाज के सामने खड़ी चुनौतियों को हम अपनी चुनौतियां मानेंगे और अपने पत्रकारीय कर्म द्वारा इनका डटकर मुकाबला करेंगे. नफरत, हिंसा, भेदभाव, सामाजिक विद्वेष, आतंकवाद जैसी समाजघाती बुराइयों के विरुद्ध अपने पाठकों को सचेत करेंगे और उन्हें ऐसी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराएंगे; जिनसे न केवल वे अपने परिवेश के प्रति जागरूक बनें बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बनें. कुल मिलाकर हमारा संकल्प था कि हम अपने समूचे पत्रकारीय दायित्व को बेहतर समाज के निर्माण का दायित्व समझेंगे और इसके मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का डटकर सामना करेंगे, मगर समझौता नहीं करेंगे.

राष्ट्रीय सहारा की बात करते हुए मैं देश के समूचे मीडिया के संबंध में, विशेषकर समाचार मीडिया के संबंध में, अपनी एक चिंता आपके साथ साझा करना चाहता हूं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज की प्रौद्योगिकी-प्रधान दुनिया में मीडिया बहुत बड़ी शक्ति है और इसकी पहुंच हर व्यक्ति के जीवन तक है. अपनी इस व्यापक पहुंच के कारण मीडिया किसी भी तरह का प्रभाव पैदा करने में सक्षम है. अगर यह प्रभाव सकारात्मक दृष्टि से प्रेरित, राष्ट्र और समाज के हित में है तो मानना चाहिए कि मीडिया अपने दायित्व का सही निर्वाह कर रहा है. लेकिन इधर जो प्रवृत्ति लगातार मजबूत हो रही है वह मीडिया पर व्यावसायिक हितों और निजी स्वार्थों के हावी होते जाने की है. इस प्रवृत्ति के कारण मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा अपने वास्तविक दायित्व को भूल कर केवल नकारात्मकता के सहारे अपने व्यवसाय का संचालन कर रहा है. इससे जुड़े लोगों के लिए न राष्ट्र का हित कोई मायने रखता है न समाज का हित.

अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए ये झूठ को सच और सच को झूठ बनाकर प्रस्तुत करते हैं, लूट-हिंसा-बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की खबरों को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं, साम्प्रदायिक हिंसा की छोटी-सी घटना को भी राष्ट्रीय घटना बना देते हैं, आतंकवाद की कोई घटना घट जाये तो इसको सबसे बड़ी खबर बना देते हैं. वे भूल जाते हैं कि आतंकवादियों का उद्देश्य आतंक का प्रसार करना होता है. जब मीडिया इसका प्रसार करता है तो वह आतंकवादियों के उद्देश्य की ही पूर्ति करने लगता है. इसके बावजूद मीडिया सनसनी पैदा करके तात्कालिक लाभ लेना चाहता है. यह भुला दिया जाता है कि तात्कालिक लाभ के लिए पैदा की गयी यह सनसनी लोगों के दिल-दिमाग पर कितना गहरा नकारात्मक असर डालती है. इससे लोगों के मन में डर, गुस्से और नफरत की भावनाएं पैदा होती हैं, जो उन्हें असामाजिकता की ओर धकेल देती हैं.

मीडिया की गैर-जिम्मेदारी सभ्य समाज पर बहुत भारी पड़ रही है. इसे इसी तरह अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो सामाजिक विघटन के गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं. मेरा सवाल है कि इसके लिए आखिर हम कर क्या रहे हैं? मेरा मानना है कि जो लोग जानबूझकर मीडिया का गलत इस्तेमाल करते हैं और अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्र विरोधी या समाज विरोधी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं वे लोग अपराधी हैं. उनके साथ अपराधियों जैसा ही व्यवहार होना चाहिए. उन्हें दंड के दायरे में लाया जाना चाहिए. राष्ट्र विरोधी या समाज विरोधी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने में जिस मीडिया संचालक, मीडिया प्रबंधक या मीडियाकर्मी का जितना बड़ा हाथ हो, उसके लिए उतने ही कड़े दंड का प्रावधान होना चाहिए. कहने का आशय यह है कि मीडिया की घातक नकारात्मकता पर रोक लगनी ही चाहिए फिर चाहे इसके लिए कोई भी उपाय क्यों न करना पड़े.

मेरा यह भी मानना है कि मीडिया के दुष्प्रभावों को रोकने में प्रिंट मीडिया यानी कि अखबार बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. इन्हें रोकने का सबसे कारगर उपाय है लोगों को उनके क्षुद्र स्वार्थों से बाहर निकालकर उनमें राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक चेतना पैदा करना. मीडिया से जुड़े जो लोग राष्ट्र हित की भावना से ओत-प्रोत हैं और समाज हित के प्रति जागरूक हैं, वे ही सकारात्मकता का वातावरण तैयार कर सकते हैं. अगर अखबार यह संकल्प लें कि वे प्रकाशित समाचारों और विचारों के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीयता की भावना भरेंगे, उन्हें उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक करेंगे, उन्हें अच्छी बातों के प्रति ग्रहणशील बनाएंगे तो नकारात्मक प्रभाव स्वत: ही कम होने लगेगा. अखबारों को यह प्रचारित-प्रसारित करना होगा कि भारत हमारा विशाल परिवार है, भारतीयता हमारा धर्म है, मानवीय आदर्शवाद हमारा जीवन दर्शन है और उनके आधार पर नकारात्मकता को पराजित करते हुए बेहतर समाज और बेहतर राष्ट्र का निर्माण हमारा कर्तव्य है. राष्ट्रीय सहारा ने हमेशा अपने इस कर्तव्य का निर्वाह किया है.

अंत में, मैं राष्ट्रीय सहारा के 25 वर्ष पूरे होने पर इससे जुड़े मीडिया के अपने सभी साथियों को हृदय से बधाई देता हूं, जिन महानुभावों ने किसी न किसी  रूप में राष्ट्रीय सहारा की विकास यात्रा में सहयोग किया है; उन्हें धन्यवाद देता हूं और उन लाखों पाठकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने राष्ट्रीय सहारा को इतना प्यार दिया. प्रिय पाठकों को मैं आश्वस्त करना चाहता हूं कि राष्ट्रीय सहारा अपने आगामी दौर में अपनी सकारात्मक भूमिका को और अधिक मजबूती के साथ निभाता रहेगा और भारतीयता तथा स्वस्थ सामाजिकता के निर्माण में अपना सार्थक योगदान करता रहेगा.
सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई!

‘सहाराश्री’ सुब्रत रॉय सहारा
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