विदेश मंत्रालय वित्त मंत्रालय के बाद ”शायद उनका दूसरा प्यार था: राष्ट्रपति

Apr 07, 2016

विदेश मंत्री के तौर पर दो बार भारत सरकार को अपनी सेवाएं दे चुके राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को कहा कि विदेश मंत्रालय वित्त मंत्रालय के बाद ”शायद उनका दूसरा प्यार था.”

साल 2014 और 2015 बैच के प्रशिक्षु भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारियों से बातचीत में राष्ट्रपति ने कहा कि विदेश सेवा के कई अधिकारियों के साथ बौद्धिक चर्चा के बारे में उनकी कई अच्छी यादें हैं और विदेश सेवा के सभी अधिकारियों के लिए उनके मन में काफी सम्मान है. विदेश सेवा के ये प्रशिक्षु अधिकारी राष्ट्रपति से मिलने यहां राष्ट्रपति भवन आए थे.

प्रणब ने कहा कि उन्होंने ”दो बार विदेश मंत्री के तौर पर सेवाएं दी हैं और मंत्रालय की अगुवाई का आनंद लिया है.”

राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, राष्ट्रपति ने कहा के ”वित्त मंत्रालय के बाद विदेश मंत्रालय शायद उनका दूसरा प्यार था.”    गौरतलब है कि प्रणब ने देश के वित्त मंत्री के तौर पर सबसे लंबे समय तक सेवाएं दी.

राष्ट्रपति ने कहा कि विदेश सेवा के अधिकारी दुनिया को भारत की कहानी बताने वाले प्रवक्ता, दुभाषिये और कथावाचक होते हैं. उन्होंने कहा कि विदेशों के मौजूदा माहौल के संदर्भ में विदेश नीति किसी देश के अपने ज्ञात हित का विस्तार होती है.

प्रणब ने कहा कि यूरोप ने सदियों से चले आ रहे संघर्ष को दरकिनार किया और एक ताकतवर संघ बना लिया. उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में ‘भुगतान संतुलन’ और ‘व्यापार की शर्तों’ ने अहमियत के मामले में ‘शक्ति संतुलन’ की जगह ले ली है.

विज्ञप्ति के मुताबिक, राष्ट्रपति ने याद किया कि मौर्य युग के दर्शनशास्त्री एवं न्यायवादी कौटिल्य ने किस तरह राजा को सलाह दी थी कि वह राजदूतों की नियुक्ति में सावधानी बरते.

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की विदेश नीति की नींव जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी और वह हमारे मूल सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित है.

उन्होंने कहा, ”नेहरू, सुभाष चंद्र बोस एवं सरदार बल्लभभाई पटेल जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर नजर रखी और इस पर विचार किया कि उन्हें किस तरह भारत के हितों से जोड़ा जाना चाहिए.”

प्रणब ने इस ”चुनौतीपूर्ण एवं रोमांचक करियर” को चुनने के लिए प्रशिक्षु अधिकारियों को बधाई दी और विदेश सेवा के अधिकारियों को विदेशों में देश की आवाज करार दिया.

उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि उनके शुरूआती साल मुश्किल हो सकते हैं और परिवारिक जीवन में दिक्कतें आ सकती हैं और उन्हें मुश्किल हालात का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन एक बार जब वे तालमेल बिठा लेंगे तो वे अपने काम का पूरा आनंद लेंगे और सदियों से मानवता का मार्गदर्शन रही सभ्यता और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के योग्य प्रतिनिधियों के तौर पर अपनी सेवाएं दे पाएंगे.

प्रणब ने पहली बार विदेश मंत्री के तौर पर फरवरी 1995 से लेकर मई 1996 तक अपनी सेवाएं दी थी. दूसरी बार उन्होंने अक्तूबर 2006 से मई 2009 तक ये पद संभाला था.

 

 

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