चुनाव आयोग की सुरक्षा अब तक के हिंसात्मक इतिहास को रोक पाएगी?

Mar 28, 2016

आशुतोष झा, कोलकाता। पश्चिम बंगाल का चुनाव और बहस का मुद्दा राजनीतिक दल नहीं बल्कि चुनाव आयोग.! आमतौर से चुनाव के मौसम में गर्म रहने वाले पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए यह अहसास नया नया सा है। चर्चा का मुद्दा यह नहीं है कि किस राजनीतिक दल का कौन सा नारा या जुमला हिट होने वाला है बल्कि पूरी बहस इस पर टिक गई है कि चुनाव आयोग की सुरक्षा तैयारी अब तक के हिंसात्मक इतिहास को रोक पाएगा?

कोलकाता में ही जन्मा और बड़ा हुआ युवा इरफान पिछले आठ साल से टैक्सी चला रहा है। एक सवाल के जवाब में वह कहता है कि पिछली बार तो हम वोट ही नहीं डाल पाए थे। कुछ लोगों ने रोक दिया था, लेकिन उसके पहले वाले विधानसभा में वोट दिए थे। उसका कहना है कि काम तो ममता बनर्जी ने भी किया है, दूसरे लोग भी करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि सरकार बदलती रहनी चाहिए।

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काम तभी होता है। फिर आगे कहता है कि इस बार पुलिस चुस्त है, इसलिए चुनाव नतीजा क्या आएगा कहना मुश्किल है। पार्क स्ट्रीट के प्रसिद्ध रेस्त्रां फ्लरीज में वरिष्ठ शेफ संजीव कुमार कहते हैं कि कोलकाता में तो बाद में मतदान है, लेकिन सुरक्षा को लेकर इतनी मुस्तैदी पहले कभी नहीं दिखी। हमारे पास पुलिस के अधिकारी भी आते हैं और उनकी बातों से यह अहसास तो हो रहा है कि जीत हार जिस किसी भी हो, वह सच्ची होगी।

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