छत्तीसगढ़ में बायोमेट्रिक पहचान न होने के कारण कई बुजुर्ग पेंशन से ​वंचित, एक बार जरूर पढ़े

Apr 28, 2017
छत्तीसगढ़ में बायोमेट्रिक पहचान न होने के कारण कई बुजुर्ग पेंशन से ​वंचित, एक बार जरूर पढ़े

छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले में बतौली विकासखंड में आने वाला एक करदाना गांव है। विकासखंड मुख्यालय से इसकी दूरी 12 किलोमीटर तथा जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर है। राज्य के करदाना गांव में सरकार ने उन लोगों की पेंशन रोक दी है, जिसने भी अब तक बैंक में आधार कार्ड नहीं जमा किया है। यह गांव चारों ओर से पहाड़ी से घिरा है तथा मुख्यतः आदिवासी ही इस गांव में रहते हैं, इस गांव में कुछ परिवार पिछड़ी जाति के हैं। गांव की जनसंख्या 946 है तथा विधवा, दिव्यांग और वृद्ध पेंशन धारियों की संख्या 195 है।

करदाना गांव की हालत ये है कि इस गांव में किसी भी बैंक की एक शाखा नहीं है और न ही यहां मोबाइल सेवा उपलब्ध है। सबसे नज़दीकी मोबाइल नेटवर्क के लिए लोगों को गांव से नौ किलोमीटर दूर एक पहाड़ पार कर के चिरंगा गांव जाना पड़ता है। पहले इस गांव के पेंशनधारियों को पेंशन नकद में दिया जाता था। जिसे बाद इन्हे पोस्ट ऑफिस के खाते के ज़रिये दिया जाने लगा। परन्तु पोस्ट ऑफिस में पर्याप्त कर्मचारी न होने की वजह से इसे बैंकों को दे दिया गया।

 

पिछले कुछ सालों में पेंशन के भुगतान में कई तकनीकी बदलाव किए गए। नवीनतम बदलावों में बायोमेट्रिक पॉइंट-ऑफ़-सेल(पीओएस) मशीन को लाया गया, जो बैंक मित्र द्वारा संचालितकी जाती है। इन मशीनों को उन जगहों पर इस्तेमाल करने के लिए लाया गया था, जहां बैंक की शाखाएं नहीं थी। पीओएस मशीन को चलाने के लिए नेटवर्क का होना जरुरी है और करदाना गांव में नेटवर्क न होने की वजह से यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने चिरंगा गांव में अपना बैंक मित्र नियुक्त किया है। बैंक मित्र पेंशनधारियों से अंगूठे का निशान लेता है, जिन पेंशनधारियों का अंगूठे का निशान उनके आधार वाले अंगूठे के निशान से मिल जाता है, वह उन्हें बदले में एक रसीद देता है। इसके बाद वह बैंक जाकर मिलान किए हुए पेंशनधारियों की पेंशन निकाल कर लाता है। और उसे पेंशनधारियों में बांट देता है। पर उस स्थिति में क्या जब गांव में नेटवर्क न आता हो।

करदाना गांव में कई ऐसे पेंशनधारी हैं जो ठीक से चल पाने में अक्षम हैं, पर फिर भी उन्हें पहाड़ चढ़कर नौ किलोमीटर दूर चिरंगा गांव में जाना पड़ता है। अपनी पेंशन लेने कई बार तो मशीन उनका अंगूठे के निशान का मिलान नहीं कर पाता, मजबूरन उन्हें बिना किसी फायदे के फिर नौ किलोमीटर दूर उस पहाड़ को पार करके लौटना पड़ता है। वे, सचमुच में मशीन की आस लेकर ही जी रहे हैं। सिर्फ करदाना गांव में ही ऐसे सात लोग हैं जिन्हें उनकी पेंशन मशीन के आने के बाद मिलना बंद हो गया है।

कई बार तो उनका भुगतान दो-तीन महीनों के लिए रुक जाता है तो उनको यह याद रखना मुश्किल हो जाता है की उन्हें कितना राशि मिलना है, जो रशीद उन्हें अंगूठा लगाने के समय दिया जाता है वह बहुत पतला एवं चिकना होता है, जिस पर से स्याही हफ्ते दो हफ्ते में मिट जाता है और वह रशीद किसी काम का नहीं रह जाता। करदाना गांव में कोई बैंक शाखा न होने के कारण, वे पासबुक प्रिंट नहीं करा पाते. इस भ्रम की स्थिति में कई बार गांव वाले बोलते हैं कि बैंक मित्र ने उन्हें बराबर पेंशन नहीं दी। पासबुक प्रिंट कराने के लिए अंबिकापुर जाने में उन्हें उनके महीने के पेंशन की आधा राशि खर्च हो जाता है। और अधिकतर बार बैंक कर्मचारी उन्हें यह बोल कर वापस कर देते हैं की प्रिंटिंग मशीन ख़राब है। यहाँ भी वे मशीन की खराबी का शिकार होते हैं।
पिछले कुछ समय से सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में आधार की अनिवार्यता विवाद का विषय है। आधार को विभिन्न योजनाओं में जोड़ने के सरकार के अथक प्रयासों के कारण कई लोगों को बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। अगर किसी व्यक्ति का आधार नंबर बन भी जाता है, एवं उसका विभिन्न डेटाबेस में सीडिंग हो भी जाता है, फिर भी कई बार उसकी पहचान बायोमेट्रिक के कारण चीजे रुक जाती है। जहां किसी लोकतंत्र में निर्णय का केंद्र लोगों के मध्य होना चाहिए, यहां ऐसा प्रतीत होता है मानो यह धीरे धीरे किसी निर्जीव मशीन में खिसकता चला जा रहा है।
हाल ही के एक चर्चा के दौरान कुछ सरकारी कर्मचारियों ने बताया उन लोगों का पेंशन रोक दिया गया है, जिन्होंने बैंक में अभी तक आधार कार्ड नहीं जमा कराया है. यह न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है अपितु, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के जीने के अधिकार की अवहेलना भी है। जैसा की पूर्व उल्लेखित है, करदाना के सात लोगों को बायोमेट्रिक पहचान न होने के कारण पेंशन मिलना बंद हो गई। उनमे से एक(देवनाथ) का पेंशन के इंतज़ार में निधन हो गया है।

बूढ़ी उम्र में हाथ की रेखाओं का साफ़ न होने से लेकर पीओएस मशीन में तकनीकी खराबी जैसे कई संभावित कारण हो सकते हैं, इन गरीब और जरुरतमंद लोगों पर अन्याय की आवाज़ कहीं खो सी गयी है।

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