‘देवदासी’ प्रथा आज भी भारत के कई हिस्सों में

May 30, 2016

महिलाओं को स्थानीय मंदिरों में पहले भगवान की सेवा के लिए समर्पित करने और फिर देह व्यापार के लिए कथित तौर पर बाध्य करने वाली प्रतिबंधित ‘देवदासी’ प्रथा आज भी भारत के कई हिस्सों में चल रही है.

‘देवदासी’ प्रथा का एक नयी किताब में दावा किया गया है. मलयालम पुस्तक ‘विसुधा पापनगालुदे इंडिया’ (भारत: पवित्र पापों की भूमि) में कहा गया है कि देवदासियों को आम पारिवारिक जीवन जीने की मनाही होती है और पेट के लिए रोटी जुटाने की खातिर वह देह व्यापार करने के लिए बाध्य होती हैं.

समाज के हाशिये पर मौजूद महिलाआें के पीड़ादायी संघर्ष तथा देवदासियों की व्यथा बताने वाली, पत्रकार अरूण इजुथाचन की यह किताब जल्द ही बिक्री के लिए दुकानों में आने वाली है.

इसमें बताया गया है कि कर्मकांडों और धार्मिक चलन के नाम पर किस तरह देवदासियों को शोषण का शिकार होना पड़ता है. अरूण ने कहा, ‘हम महिलाओं के खिलाफ अलग-अलग तरह के शोषण और उन्हें प्रताड़ना के बारे में बात करते हैं लेकिन देवदासी जैसे हाशिये पर रहने वाले समूहों की समस्याएं अलग हैं.’

उन्होंने कहा, ‘यह जान कर सचमुच हैरत होती है कि सदियों पुराने रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के नाम पर आज 21 वीं सदी में महिलाओं का शोषण होता है. उत्तर प्रदेश में वृन्दावन की विधवाओं की दुखदायी गाथा भी अलग नहीं है जिन्हें कृष्ण की प्रेयसी राधा की तरह रहना होता है.’

डीसी बुक्स द्वारा प्रकाशित इस किताब में कमाठीपुरा और सोनागाछी सहित देश के विभिन्न रेडलाइट इलाकों में रह कर देह व्यापार करने वाली महिलाओं के जीवन पर और उनकी समस्याओं पर भी प्रकाश डाला गया है.

किताब में, परिवार और समाज द्वारा त्यागे जाने के बाद मंदिरों के शहर वृन्दावन जा पहुंचीं कुछ विधवाओं के साक्षात्कार से आधुनिक भारत में हाशिये पर रह रही महिलाओं के जीवन की तकलीफदायक तस्वीर उभरती है.

दैनिक मलयाला मनोरमा के एक पत्रकार अरूण ने बताया, ‘कानून की किताबों के अनुसार, देवदासी प्रथा देश में कहीं नहीं चल रही है और अलग-अलग समय पर कानून के जरिये इसे सभी राज्यों में प्रतिबंधित किया जा चुका है. लेकिन मैं ऐसी कई महिलाओं से मिला हूं जो कर्नाटक सहित विभिन्न राज्यों के गांवों में हालिया समय में भगवान की सेवा में समर्पित हुई हैं.’

उन्होंने कहा कि इन महिलाओं को किसी से भी विवाह करने की या आम पारिवारिक जीवन जीने की अनुमति नहीं है लेकिन इनमें से कई या तो अपने खुद के गांव में या शहरों के रेडलाइट इलाकों में देह व्यापार करने के लिए बाध्य हैं.

पुस्तक में कहा गया है कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार,अकेले कर्नाटक में ही 46,000 पूर्व देवदासियों की पहचान हुई है. इन महिलाओं को मात्र 500 रूपये मासिक पेन्शन मिल रही है.

इस पुस्तक में दावा किया गया है कि समाज की उच्च जातियों का एक वर्ग चाहता है कि देवदासी प्रथा चलती रहे। किताब के अनुसार, कुछ समूह धर्मांतरण के मद्देनजर पीड़ितों की मदद करते हैं.

लेखक ने बताया,‘यह किताब मेरे सात साल के शोध और देश के सात राज्यों के मेरे बेहिसाब दौरे का नतीजा है. उम्मीद है कि इससे पाठकों को समाज के हाशिये पर रह रही महिलाओं की समस्याओं की वास्तविक स्थिति का पता चल सकेगा.’

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