देवबंद भारत माता की जय बोलने पर फतवा जारी करता है आतंकवाद के खिलाफ नहीं

Apr 04, 2016

केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने कहा कि देवबंद यदि आतंकवाद के खिलाफ भी फतवा जारी करता तो उसका स्वागत किया जाता.

केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि देवबंद भारत माता की जय न बोलने के लिये तो फतवा जारी करता है लेकिन आतंकवाद के खिलाफ नहीं.

उन्होंने कहा ‘देवबंद अगर आतंकवाद के खिलाफ भी फतवा जारी करता तो मैं उसका स्वागत करती.’

साध्वी रविवार को अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय संस्थान की ओर से ‘जनांकिकी : राष्ट्र का भाग्य’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रही थी. उन्होंने कहा कि देश की सभ्यता, संस्कृति और समाज की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता. देश में आजादी से पहले जैसे स्थितियां दिखाई दे रही है.

हम व्यवहारिक दृष्टि से आजाद हैं लेकिन मानसिक तौर पर गुलाम हैं. हम बाहर आक्रांताओं से संघर्ष करते है लेकिन देश के अंदर उठने वाले विरोध के स्वर आत्मा को झकझोर देते है. उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति और समाज सीमाओं में नही बंधा है.

उन्होंने कहा कि ‘मेरे मुंह से एक शब्द धोखे से निकल गया तो एक महीने तक संसद नहीं चलने दी गई, लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगे तो किसी भी टीवी चैनल में चर्चा नहीं हुई. दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे लोगों के हौसले क्यों बुलंद हो रहे हैं. आजादी के बाद से जिन लोगों के हाथ में सत्ता रही है उनके नुमाइंदे जेएनयू में जाकर देश विरोधी नारे लगाने वालों की वकालात करतें हैं. वामपंथी वकालत करें तो चलेगा क्योंकि उनकी विचारधारा है.’

साध्वी ने कहा कि संविधान में जब विकास के लिये सबका समान अधिकार है, तो जनसंख्या के लिये भी सबका समान अधिकार होना चाहिए. चाहे हिंदू हों या मुसलमान.. दो बच्चों से ज्यादा पैदा होने पर उनकी सरकारी नौकरी, सरकारी खाद्यान, सभी सरकारी सुविधाएं खत्म होना चाहिए. यह सब के लिये लागू होना चाहिए.’

 

साध्वी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आजादी के बाद भी देश में बडा काम किया है. जिन दूरदराज के इलाकों में सरकार नहीं पहुंच पाई वहां संघ ने एकल विद्यालयों के जरिए शिक्षा पहुंचाई है. संघ देश को तोड़ने का नहीं बल्कि देश को जोड़ने का काम करता है.

संगोष्ठी में आरएसएस विचारक प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि जैसे ही किसी देश में उसके मूल धर्मावलम्बियों की संख्या कम होती जाती है, वह देश अपना अस्तित्व खोने लगता है. उदाहरणों से बताया कि किस प्रकार विश्व के अनेक देश जनसंख्या असंतुलन के कारण अपनी मूल संस्कृति से कट चुके हैं.

उन्होंने कहा कि भारत के साथ लगातार ऐसा हो रहा है.

उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में प्राचीनकाल से ही देश के विभिन्न क्षेत्रों की भाषा, वेषभूषा, खानपान, रीति रिवाज, त्यौहार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी सांस्कृतिक जीवन दर्शन की अन्तरधारा एक ही बनी रही.

सभी उपासक पद्घतियाँ या मजहब न केवल एक दूसरे के प्रति सहिष्णु रहे बल्कि सह अस्तित्व की भावना रखते हुए एक दूसरे का सम्मान भी करते रहे लेकिन विदेशी आक्रान्ताओं और घुसपैठ के कारण भारतीय संस्कृति को गहरा आघात पहुँचा है.

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